ललित मोहन गहतोड़ी की कविता- तुम सुनो तो
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें
दिल के भीतर सिल चुके जज्बात कह लें
मिट गये थे जो विगत के दायरे में
उनको भी सबकुछ मिला कर साथ कह लें
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें
उस समय तो तुमने कुछ भी ना कहा था
जब मैं तुमसे बाजु भर में गैर में था
तब तो तुमने बात मेरी बेसुनी की
दिल के ये जज्बात तुमने अनसुनी की
आज फिर से आओ मिलकर बात कर लें
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें
कह दिया था मैंने तुमसे सुन लो मेरी
क्यों सुनी नहीं मैं भी बैठा चुप सा तन्हा
कहता किससे बात तेरे इस सितम की
इसलिए तो अब तलक था मौन बैठा
अब जो हमने तोड़ डाले कच्चे ताले
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
तुम कहो तो रात को अब रात कह लें
तुम कहो तो लाख को अब खाक कर लें
खाक छानी है तुम्हारे यह सितमगर
तुम कहो तो रात को अब चांद कह लें
तुम कहो तो साथ को अब साथ कर ले़
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें
तुम कहों तो बाजुओं में रात कर लें
तुम कहो तो चुप ही पूरी रात कह लें
तुम कहो तो बात सारी बात कह लें
तुम कहो तो आंसू की बरसात कर लें
तुम कहो तो गम समंदर पार कर लें
तुम सुनो तो फिर से अपनी बात कर लें
कवि का परिचय
ललित मोहन गहतोड़ी काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


