अंतर्मन का वाद विवाद एक जंग है जिसने इसे पढ़ा नहीं वो जीवन की कठिनाइयों को समझा ही नहीं अरे...
नारी मंच
आओ जनता अब तो आओ होशो हवाश में ना आओ अब चुनावी जुमले के आगोश में, गांव अपना समर्पण करने...
हां ! असफलता जब जब खुद को दोहराती है हमें बहुत कुछ नया सिखाती है मेरी कलम से मेरा नाता...
सुनो आज कुछ लिखूं, इसका ख्याल आया है तो लिखूं क्या ये ख्याल ही नहीं बन पाया है, तो सोचा...
अपारदर्शी घटना से जब एक भावपूर्ण इंसान का भाव शून्य हो जाता है जब गुजरता है इंसान इस राह से...
बहुत ज्यादा सोचने वाले लोग खुद के लिए बुरे होते हैं खुद को विचारों के आगोश में थामे नहीं दे...
खुद की खामोशी में छिपे शोर से एक रोज रिहा हो जाएंगे जब तब बताएंगे पहचाना तो सही थोड़ा जान...
विचारों में नकारात्मकता का प्रवेश यूं ही नहीं होता, साफ मन का छले जाना, अलगाव का भाव मिल जाना, सही...
काश चरित्र को पवित्र करने का भी कोई इत्र होता फिर से दोहरा पाता उन कोशिशों को जो नाकाम रही...
जिन्दगी की राह चाह से अलग हो गई हर नाकाम चाह का डर खत्म हो गया मचलती इच्छाएं ख़त्म हो...
