ललित मोहन गहतोड़ी की कविता- कलम खामोश
कलम खामोश
कलम खामोश कर दी अब
लगा कर रोप कर दी तब
रखे थे जो तखत पर सब
जला कर राख कर दी तब
हटा कर साफ कर दी अब
सवेरे देखते थे तब
रटाए बोलते थे जब
अब ना दिखते हैं वो सब
जरां के पार कर दी तब
फलां खामोश कर दी सब (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
नहीं निकलेगा सूरज अब
तलक जब बात होगी तक
नहीं धड़केगा दिल तब तक
जरां के पास होने तक
जवां खामोश कर दी अब
नहीं चमकेंगे जुगनू अब
नहीं गाएगी कोयल तक
नहीं बरसेंगे बादल अब
तलक जब रोष कर दी तब
शमां खामोश कर दी अब (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
कया से अब लगेंगे जब
हदां के पार होगी तब
तलक जब हम रहेंगे तक
जुबां से पार कर दी तब
कलम खामोश कर दी अब
कवि का परिचय
ललित मोहन गहतोड़ी काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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Bhanu Bangwal
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मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


