अल नीनो की आहट से डरा मानसूनः गर्मी के साथ आसमान और समुद्र बैचेन, सूखा और पानी संकट का खतरा, किसानों को ये सलाह
इस साल की गर्मी सभी को बैचेन करने वाली है। हालांकि, उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों में मई माह में ऐसी बारिश हो रही है, जैसे जुलाई माह में होती है। इससे एक दो दिन गर्मी से राहत भी मिल रही है। साथ ही अल नीनो के नाम पर खतरे की घंटी भी बज रही है। कारण ये है कि 2026 की गर्मियों में भारत सिर्फ गर्मी से नहीं जूझ रहा। इस बार आसमान भी बेचैन है। साथ ही समुद्र भी। मौसम की दुनिया में चल रही हलचल का असर खेतों से लेकर बिजली, पानी, खाद्य सुरक्षा और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक पहुँच सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कमजोर ला नीनो से हुई थी साल की शुरुआत
इस साल की साल की शुरुआत कमजोर ला नीनो से हुई थी। अभी दुनिया ENSO न्यूट्रल स्थिति में है। प्रशांत महासागर के भीतर कुछ बदल रहा है। धीरे-धीरे नहीं, तेज़ी से। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया एक मजबूत एल नीनो की तरफ बढ़ रही है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2026-27 में दुनिया “Very Strong El Niño” देख सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पहले ही संकेत दे चुका है आईएमडी
भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी, Indian Meteorological Department ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश Long Period Average यानी 870 मिमी का करीब 90 प्रतिशत रह सकती है, जिसमें ±4% की त्रुटि सीमा है। IMD के प्रॉबेबिलिटी फोरकास्ट में 60 प्रतिशत संभावना “deficient rainfall” की है, जबकि 24 प्रतिशत संभावना “below normal rainfall” की बताई गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सामान्य और कमजोर मानसून की सीमा पर खड़ा भारत
यह फर्क तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा है। भारत सामान्य और कमजोर मानसून की सीमा रेखा पर खड़ा है। यह सिर्फ बारिश कम होने की कहानी नहीं है। असल चिंता उस अस्थिरता की है, जो एक विकसित होते एल नीनो के साथ आती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है अल नीनो
मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि एल नीनो कोई साधारण समुद्री घटना नहीं। यह पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है। खासकर भारत जैसे उपोष्णकटिबंधीय देशों को। एल नीनो बनने पर प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाला Walker Circulation कमजोर पड़ जाता है। इसका असर यह होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर उच्च दबाव बनने लगता है। नम हवा ऊपर नहीं उठ पाती। बादल कमजोर पड़ते हैं। और मानसून की बारिश टूटने लगती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस कारण से बढ़ रही चिंता
इस बार एक और बात चिंता बढ़ा रही है। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि “evolving El Niño”, यानी बनता हुआ अल नीनो, उतना ही खतरनाक हो सकता है, जितना पूरी तरह स्थापित अल नीनो। क्योंकि, मॉनसून को स्थिर वातावरण चाहिए। वहीं, जब महासागर और वायुमंडल खुद अस्थिर हों, तो मौसम में रुकावटें बढ़ जाती हैं। फिर बारिश आती है। रुक जाती है। फिर अचानक तेज़ हो जाती है। लंबे “break monsoon” बनते हैं। यानी खेतों के लिए सबसे मुश्किल स्थिति। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस दौरान अल नीनो बनने की संभावना ज्यादा
अमेरिका की National Oceanic and Atmospheric Administration यानी NOAA के मुताबिक, मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत है। दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत तक पहुँचती है। समुद्र के तापमान को मापने वाला RONI इंडेक्स भी अब ENSO Neutral की सीमा पार कर चुका है। वैज्ञानिक इसे शुरुआती संकेत मान रहे हैं कि प्रशांत महासागर गर्म हो रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डराता है इतिहास
1950 के बाद दुनिया ने सिर्फ चार “Super El Niño” देखे हैं।
1982-83
1991-92
1997-98
और 2015-16 (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इन घटनाओं में हुई थी बढ़ोत्तरी
सुपर अल नीनो के इन वर्षों ने दुनिया भर में सूखा, गर्मी, जंगल की आग और मौसम की चरम घटनाओं को बढ़ाया था। अब मॉडल बता रहे हैं कि 2026 का एल नीनो भी उसी श्रेणी के करीब जा सकता है।
सबसे गर्म साल बन सकता है 2027
स्काइमेट वेदर में मौसम और जलवायु परिवर्तन विभाग के अध्यक्ष एवं भारतीय वायुसेना में एयर वाइस मार्शल रह चुके जीपी शर्मा कहते हैं कि महासागर रिकॉर्ड गर्मी की तरफ बढ़ रहे हैं। उनके मुताबिक 2024 को पीछे छोड़ते हुए वर्ष 2027 दुनिया का सबसे गर्म साल बन सकता है। वह याद दिलाते हैं कि महासागर मानव गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने भीतर सोख चुके हैं। यानी अल नीनो अब सिर्फ प्राकृतिक घटना नहीं रह गया। वह ग्लोबल वार्मिंग की पृष्ठभूमि पर और खतरनाक बन रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये भी है चिंता का विषय
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के एमेरिटस प्रोफेसर हैं और IIT कानपुर में विजिटिंग प्रोफेसर रघु मूर्थुगुड्डे (Raghu Murtugudde) भी कहते हैं कि इस बार सबसे बड़ी चिंता बारिश का वितरण है। उनके मुताबिक कुल बारिश का आंकड़ा उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि बारिश कहाँ और कब होगी। झेलनी पड़ सकती है खतरनाक गर्मी
वह चेतावनी देते हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत में इस साल “humid heatwaves” यानी उमस भरी खतरनाक गर्मी देखने को मिल सकती है। खासकर अगर जुलाई तक मानसून ठीक से नहीं पहुँचा। तब पाकिस्तान की तरफ से आने वाली गर्म हवाएँ और अरब सागर की नमी मिलकर हालात और मुश्किल बना सकती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत के लिए कम बारिश की चिंताएं
भारत के लिए यह चिंता सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं। देश की लगभग 52 प्रतिशत खेती अब भी बारिश पर निर्भर है। देश के 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन का रिश्ता सीधे मानसून से जुड़ा है। कम बारिश का मतलब सिर्फ कम फसल नहीं।
कम भूजल रिचार्जक, कम reservoir level, कम hydropower generation और शहरों में बढ़ता जल संकट की परेशानी देश में झेलनी पड़ सकती है।
Intergovernmental Panel on Climate Change या IPCC रिपोर्ट्स में योगदान देने वाले अंजल प्रकाश (Anjal Prakash) कहते हैं कि भारत को अब integrated water management की तरफ तेजी से बढ़ना होगा। वह rainwater harvesting, aquifer recharge, drip irrigation, crop diversification और treated wastewater reuse जैसी रणनीतियों पर जोर देते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सबसे गहरी चिंता खेतों की
इस बार खेतों की चिंता शायद सबसे गहरी है। खाद्य नीति विश्लेषक देवेंद्र शर्मा का कहना है कि यह साल भारत के लिए climate change और geopolitical uncertainty के बीच “testing ground” साबित हो सकता है। वह कहते हैं कि उर्वरक संकट, बढ़ती महंगाई और कमजोर मानसून साथ आए तो इसका असर सीधे किसानों पर पड़ेगा। उनके मुताबिक भारत को अब agroecology और non-chemical agriculture की तरफ गंभीरता से बढ़ना होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
किसानों को दी गई ये सलाह
Centre for Sustainable Agriculture में Executive Director डॉ. जीवी रामानजनेयुलु कहते हैं कि असली समस्या सिर्फ कम बारिश नहीं, बल्कि dry spells होंगे। अगर एक हफ्ते से ज्यादा बारिश रुकी, तो मिट्टी फसलों को सहारा नहीं दे पाएगी। वह सलाह देते हैं कि किसान धान जैसी पानी-खपत वाली फसलों से कुछ दूरी बनाएं और pulses, oilseeds और millets की तरफ बढ़ें। साथ ही मिट्टी में organic matter बढ़ाना अब सिर्फ sustainable practice नहीं, survival strategy बनता जा रहा है। फिर भी मौसम की कहानी कभी सीधी रेखा में नहीं चलती। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हिंद महासागर से उम्मीद
इसके बावजूद एक उम्मीद हिंद महासागर में भी छिपी है। Indian Ocean Dipole यानी IOD। कई बार positive IOD ने अल नीनो के असर को कमजोर किया है। 2026 में भी इसके positive phase में जाने की संभावना बढ़ रही है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अल नीनो बहुत मजबूत हुआ, तो IOD अकेले उसे पूरी तरह संतुलित नहीं कर पाएगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में मानसून का महत्व
भारत में मानसून हमेशा सिर्फ मौसम नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था है। राजनीति है। कृषि है। पानी है। रसोई है। करोड़ों लोगों की मानसिक स्थिति है। इसलिए जब वैज्ञानिक “Very Strong El Niño” कहते हैं, तो उसका मतलब सिर्फ समुद्र का गर्म होना नहीं होता। उसका मतलब होता है, आने वाले महीनों में भारत को हर बूंद पानी, हर फसल, हर हीटवेव और हर मौसम चेतावनी को पहले से ज्यादा गंभीरता से लेना पड़ सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अल नीनो और ला नीना को समझिए
अल नीनो और ला नीना प्रशांत महासागर में घटने वाली विपरीत मौसमी घटनाएँ हैं, जो पूरी दुनिया के मौसम, तापमान और बारिश के पैटर्न को प्रभावित करती हैं। ये दोनों ‘अल नीनो-दक्षिणी दोलन’ (ENSO) चक्र का हिस्सा हैं।
अल नीनो (El Nino)
अर्थः यह स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘छोटा बच्चा’ या ‘बाल यीशु’ होता है।
स्थिति: इस दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यहाँ की सामान्य व्यापारिक हवाएँ (जो गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं) कमजोर पड़ जाती हैं।
प्रभाव: इसके असर से दक्षिण अमेरिका के तटों पर भारी बारिश और बाढ़ आती है । वहीं, भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखे और भीषण गर्मी की स्थिति बन जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ला नीना (La Nina)
अर्थ: ला नीना का अर्थ ‘छोटी बच्ची’ होता है।
स्थिति: यह अल नीनो के बिल्कुल विपरीत अवस्था है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी कम (ठंडा) हो जाता है और व्यापारिक हवाएँ सामान्य से अधिक मजबूत हो जाती हैं।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


