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May 28, 2026

खतरनाक चक्र में प्रवेश कर रहे लोग, अब भारत में बिजली की मांग विकास के लिए नहीं, इसे तय कर रही है गर्मी

देश में इन दिनों नौतपा शुरू हो चुका है। वो नौ दिन, जिन्हें उत्तर भारत में हमेशा से साल की सबसे कठिन गर्मी का समय माना जाता रहा है। पुराने लोग बताते थे कि इन दिनों दोपहर धीमी हो जाती थीं। बाज़ार जल्दी बंद हो जाते थे। लोग घरों में खस की टट्टियाँ लगाते थे। मिट्टी के घड़ों का पानी ठंडक देता था। रातें गर्म होती थीं, लेकिन इतनी नहीं कि शरीर को आराम ही न मिले। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अब गर्मी से राहत नहीं देती हवा
गर्मी तब भी पड़ती थी, लेकिन गर्मी “जीने के खिलाफ” नहीं लगती थी। आज लगती है। आज कई शहरों में बाहर निकलना ऐसा महसूस होता है, जैसे किसी ने पूरे शहर पर हेयर ड्रायर चला दिया हो। हवा राहत नहीं देती। चेहरे पर हमला करती है। इस बदलती हुई गर्मी की सबसे बड़ी कहानी थर्मामीटर नहीं बता रहा। इसे बिजली का मीटर बता रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

15 साल में दोगुनी हुई बिजली की मांग
इस साल भारत की पीक पावर डिमांड 270 गीगावॉट तक पहुँच गई। उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग 31,000 मेगावॉट पार कर गई। करीब 15 साल पहले ये लगभग आधी थी। पहले बिजली की बढ़ती मांग को विकास की निशानी माना जाता था। ज़्यादा फैक्ट्री। ज़्यादा उद्योग। ज़्यादा समृद्धि। अब कहानी बदल रही है। अब भारत की बिजली की मांग का बड़ा हिस्सा आकांक्षी मांग नहीं रहा। वो तापीय मांग बनता जा रहा है। यानि ऐसी मांग जो सुविधा नहीं, शरीर की जीवित रहने की ज़रूरत से पैदा हो रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ये भी हैं गर्मी के कारण
अब समस्या सिर्फ दोपहर की गर्मी नहीं है। समस्या ये है कि रातें भी शरीर को सामान्य होने का मौका नहीं दे रहीं। कंक्रीट दिनभर गर्मी सोखता है और रातभर छोड़ता रहता है। एसी बाहर गर्म हवा फेंकते हैं। पेड़ कम होते जा रहे हैं। शहर हवा के रास्ते खोते जा रहे हैं। धीरे धीरे भारतीय शहर विशाल हीट ट्रैप बनते जा रहे हैं। नमी इस संकट को और खतरनाक बना रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

बढ़ रहे हैं उमस और अत्यधिक गर्मी वाले दिन
एक दशक में भारत में अत्यधिक गर्म और उमस वाले दिनों की संख्या 14,086 से बढ़कर 16,970 हो चुकी है। यानि ऐसे दिन जब सिर्फ तापमान नहीं, हवा की नमी भी शरीर को ठंडा होने से रोकती है। यही वजह है कि अब रात 11 बजे भी कई शहरों में बिजली की मांग नीचे नहीं गिरती। लोग एसी बंद नहीं कर पा रहे। कूलर बंद नहीं कर पा रहे। पंखा सिर्फ गर्म हवा घुमा रहा होता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

बदल रहा है ऊर्जा व्यवहार
ये सिर्फ मौसम नहीं बदल रहा। ये भारत का ऊर्जा व्यवहार बदल रहा है। अब बिजली विलासिता नहीं लगती। जीने की बुनियादी ज़रूरत लगने लगी है। यहीं सबसे बड़ा असमानता संकट छुपा हुआ है। जिसके पास एसी है, इन्वर्टर है, बेहतर घर है, वो गर्मी से कुछ हद तक बच सकता है। जिसके पास नहीं है तो उसका शरीर सीधे जलवायु परिवर्तन को झेलता है। डिलीवरी राइडर, ट्रैफिक पुलिस, मज़दूर, रेहड़ी वाले, निर्माण श्रमिक इस गर्मी को ज्यादा झेलते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

आने वाले दिनों में विकराल होगी समस्या
जलवायु परिवर्तन कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है। वो जलती हुई सड़क है। पसीने से भीगी रात है। नींद न आना है। चक्कर आना है। सुबह उठकर फिर उसी गर्मी में काम पर जाना है। सबसे खतरनाक बात शायद ये है कि हम अभी शुरुआत में हैं। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत के करीब 40% घरों में एसी हो सकता है। सोचिए तब शहर कितनी बिजली माँगेंगे। एसी कितनी गर्मी बाहर फेंकेंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

खतरनाक चक्र में प्रवेश कर रहे हैं हम
यानि हम एक खतरनाक चक्र में प्रवेश कर रहे हैं। जितनी गर्मी बढ़ेगी, उतनी ठंडक की मांग बढ़ेगी। जितनी ठंडक की मांग बढ़ेगी, उतनी बिजली लगेगी। जितनी बिजली लगेगी, उतनी उत्सर्जन और अतिरिक्त गर्मी बढ़ेगी। शहर उतने ही ज्यादा गर्म होंगे। इसलिए भारत की हीटवेव कहानी अब सिर्फ मौसम की कहानी नहीं है। ये शहरी नियोजन की कहानी है। जनस्वास्थ्य की कहानी है। मज़दूरों की कहानी है। आवास की कहानी है। बुनियादी ढाँचे की कहानी है। शायद आने वाले समय में शासन की कहानी भी बनने वाली है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

जीने की शर्त बनती जा ही बिजली
भारत के कई शहरों में अब बिजली विकास का प्रतीक कम, जीने की शर्त ज़्यादा बनती जा रही है। शायद यही इस नौतपा की सबसे बड़ी कहानी है। भारत सिर्फ गर्म नहीं हो रहा। भारत खुद को ठंडा रखने के लिए बिजली पर निर्भर होता जा रहा है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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