अगर स्वच्छ बिजली और ग्रीन हाइड्रोजन बढ़ें साथ तो ग्रीन स्टील नहीं होगी महंगी: नई रिपोर्ट
स्टील बनाना दुनिया के सबसे प्रदूषणकारी औद्योगिक कामों में से एक है। भारत जैसे देश के लिए ये एक चुनौती और भी बड़ी है। एक तरफ़ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को स्टील चाहिए, दूसरी तरफ़ कार्बन उत्सर्जन भी घटाना है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ग्रीन स्टील बनाना बहुत महंगा पड़ेगा? इसका जवाब TransitionZero की नई रिपोर्ट कहती है, शायद नहीं। अगर स्वच्छ बिजली और ग्रीन हाइड्रोजन की योजना साथ-साथ बनाई जाए, तो भारत में स्टील उत्पादन को कम-कार्बन बनाने की लागत उम्मीद से कहीं कम हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ये कहती है रिपोर्ट
रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत के इलेक्ट्रिक और गैस आधारित स्टील संयंत्रों में 70 प्रतिशत घंटे कार्बन-मुक्त बिजली और 20 प्रतिशत ग्रीन हाइड्रोजन मिश्रण को एक साथ अपनाया जाए, तो उत्पादन लागत में केवल करीब 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन कम होगा और यूरोपीय संघ के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) जैसे नियमों से जुड़े जोखिम भी घटेंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जोनों उपाय एक साथ लागू करने से होगा फायदा
रिपोर्ट बताती है कि आज तक इन दोनों उपायों को अलग-अलग देखा जाता रहा है। असली फायदा तब मिलता है जब इन्हें एक साथ लागू किया जाए। जब राउंड-द-क्लॉक कार्बन-मुक्त बिजली के लिए अतिरिक्त रिन्यूएबल एनर्जी तैयार की जाती है, तो उसका कुछ हिस्सा कई बार इस्तेमाल नहीं हो पाता और उसे बंद करना पड़ता है। रिपोर्ट कहती है कि इसी अतिरिक्त बिजली का उपयोग ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में किया जा सकता है। इससे सौर ऊर्जा की बर्बादी, यानी सोलर कर्टेलमेंट, में 90 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है और दोनों तकनीकों की लागत भी घट सकती है। यह विश्लेषण भारत के वर्ष 2030 के बिजली ग्रिड के प्रति घंटे के मॉडल पर आधारित है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
TransitionZero की Heavy Industry Lead Verity Crane कहती हैं कि भारत का मौजूदा 43 प्रतिशत रिन्यूएबल लक्ष्य स्टील क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को कम करके आंकता है। उनके मुताबिक चौबीसों घंटे कार्बन मुक्त बिजली अपनाने से घरेलू कोयले पर निर्भरता कम होगी, जबकि ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल महंगी आयातित गैस की जरूरत घटा सकता है। उनका कहना है कि कई भारतीय स्टील कंपनियां इन दोनों तकनीकों पर अलग-अलग काम कर रही हैं, लेकिन यदि इनकी योजना एक साथ बनाई जाए तो ग्रीन स्टील का आर्थिक लाभ और बढ़ सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्टील क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन जलवायु लक्ष्यों के लिए अहम
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक है और आने वाले वर्षों में देश में स्टील की मांग लगातार बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में स्टील क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए भी अहम माना जाता है। रिपोर्ट का संदेश साफ़ है। ग्रीन स्टील सिर्फ़ नई तकनीक अपनाने का सवाल नहीं है। यह ऊर्जा प्रणाली की बेहतर योजना का भी सवाल है। अगर रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और बिजली ग्रिड को एक साथ सोचकर विकसित किया जाए, तो कम उत्सर्जन वाला स्टील सिर्फ़ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी अधिक व्यवहारिक बन सकता है।
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