ललित मोहन गहतोड़ी की कविता- मंजिल
चल चला चल तू चला चल
जा चुका जो घर के अंदर
उसकी मर्जी उसका करतब
राह जो थामी थी उसने
आज उसको मिल चुकी है
आज वह सब सुन चुका
दिल दर्द सारे बुन चुका वो
अपनी मंजिल चुन चुका है (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
अब ना चाहो उसको तुम फिर
अब ना छेड़ो उसके गम कुछ
अब ना मानो बात उसकी
सर जो ऊपर जाए खिसकी
उसकी मत अब बात कर तुम
मत कोई जज्बात कह तुम
धरनी करनी सुन चुका वो
अपनी मंजिल चुन चुका है (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
कह रहा था तुमसे उस दिन
मान लो तुम बात मेरी
तुमने फिर से अनसुनी की
उसके दिल पर दर्द था कुछ
दर्द दिल का वह बेदर्दी
जिसको है वह भूल बैठा
अपने सपने बुन चुका वो
अपनी मंजिल चुन चुका है (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
कवि का परिचय
ललित मोहन गहतोड़ी काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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Bhanu Bangwal
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मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


