युवा कवि सूरज रावत की कविता- कभी हवा में तो कभी पानी से घनघोर प्रलय
कभी हवा में तो कभी पानी से घनघोर प्रलय हो रहे हैं,
किस भूल की सजा मिल रही है, जो निर्दोष मौत में विलय हो रहे हैं,
क्या हुयी है खता हे भगवन, क्यों है प्रकृति हमारी इतना रोष में,
कहीं हो रहे हैं तबाही के मंजर, तो कहीं मासूम आ रहे हैं मौत के आगोश में,
निज स्वार्थ के लिए मनुष्य ने जब इस प्रकृति को हर तरह से निचोड़ा है,
ऐसी हृदयविदारक घटना बतलाती है, अब प्रकृति ने भी हमसे अपना मुँह मोड़ा है, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
कहीं हुआ अवैध खनन, कहीं तमाम पेड़ कटे,
हर तरह से प्रकृति के साथ खिलवाड़ हुआ,
अत्याचारों के रोष में आकर, प्रकृति का आज फिर एक बार तगड़ा प्रहार हुआ,
घर उजड़े हैं, सुहाग उजड़े हैं, कई मासूमों के सपने अधूरे रह गये हैं,
कई परिवार ख़त्म हो गये, कई नौनिहाल इस तबाही में बह गये हैं,
हे मानव जरा सोचो ऐसे विकट संकटों को कब तक ऐसे सह पाओगे,
आज फिर आगाह किया है प्रकृति ने, क्या फिर वो ही गलती दोहराओगे।
कवि का परिचय
सूरज रावत, मूल निवासी लोहाघाट, चंपावत, उत्तराखंड। वर्तमान में देहरादून में निजी कंपनी में कार्यरत।
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