युवा कवि सूरज रावत की कविता- आज ये मेरा देश किस गर्त की ओर जा रहा
अफ़सोस
आज ये मेरा देश
किस गर्त की ओर जा रहा है,
विश्व का मजबूत लोकतंत्र
कहलाने वाला मेरा देश,
आज राजनीति की
गर्दिश में पल रहा है,
जिस युवा की जवानी
देश को संवारने के काम आनी चाहिए थी,
आज वही मजबूर युवा
सड़कों पर उतर रहा है,
न्याय और जवाबदेही की खातिर
आंदोलन कर रहा है, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
राजनीति की रोटियां सेंकने वालों के
कानों में जूं तक नहीं रेंगते,
और यहाँ एक तरफ
युवा भूख हड़ताल करके
अपना हक मांग रहा है,
अफ़सोस आज ये मेरा देश
किस गर्त की ओर जा रहा है,
यहाँ राजनीति का दांव पेंच खेलकर
हर किसी का मुंह
बंद करा दिया जाता है,
गरीब चाहे गरीबी से मरे, और
आवाज़ उठाने वाला
चाहे चिल्ला चिल्लाकर मर जाये,
पर यहाँ का ये राजनैतिक खेमा
अपने ही गुण गा रहा है,
अफ़सोस आज ये मेरा देश
किस गर्त की ओर जा रहा है, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
कभी छात्र आंदोलन,
कभी किसान आंदोलन,
कभी महंगाई की मार,
कभी गरीब जनता पर अत्याचार,
शासन की अव्यवस्था के खातिर
कोई जंतर मंतर में प्राण त्याग रहा है,
कोई हर उम्मीद से रोते बिलखते
इनसे अपना हक मांग रहा है,
पर इस देश का राजनैतिक खेमा
बस आरोप प्रत्यारोप की
राजनीति कर रहा है,
अफ़सोस आज ये मेरा देश
किस गर्त में जा रहा है ,
भारत को विश्वगुरु बनाने का
सपना तो देख लिया तुमने,
तुम्हारी राजनीति की भेंट जो चढ़ रहा है, (कविता जारी अगले पैरे में देखिए)
यहाँ का युवा, यहाँ की धरोहरें,
क्या ये नहीं देखा तुमने,
क्या करोगे दुनिया भर में
अपना डंका बजाकर,
जब अंदर से ही कमजोर कर दिया तुमने
इस देश को, इसकी नींव हिलाकर,
देश के हालातों की सुध
तो कोई ले ही नहीं रहा है,
बस हर कोई यहाँ
अपना राजनैतिक उल्लू
सीधा कर रहा है,
ये मेरा देश
आज राजनीति की भेंट चढ़ रहा है,
अफ़सोस आज ये मेरा देश
किस गर्त की ओर जा रहा है ,
कवि का परिचय
सूरज रावत, मूल निवासी लोहाघाट, चंपावत, उत्तराखंड। वर्तमान में देहरादून में निजी कंपनी में कार्यरत।
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