सूखे पत्ते कहते हैं सूखे पत्ते कहते हैं, सूख गया सो झड़ गया, अपनो से बिछड़ गया, पतझड़ के मौसम...
Literature
रोज़ा उठा-पोड़ रोज़-रोज़ा उठा-पोड़ मा,दिन इनी ठिलेंणा छन. एक- हैंका दगड़ि, बोलि- चालिक बितेंणा छन.. एक समै छौ, रात-दिन काम-काजे...
कद्र उसी की है जग में, जिसके मुंह पर खुशबू हो ! देवभूमि का रहने वाला हूं ! कभी पक्षपात...
बदला क्या है? बदला क्या है? कुछ भी तो नही! वही फीके चेहरे, वही तीखे तेवर, वही दिखावटी रिश्ते, वही...
फागुनी बयार आ गई है ऋतु सुहानी, वसंती बयार लेकर। फागुनी कोमल पवन वह, हाथ फेरे सिर पे सर सर।...
हिकमत जंजोऴौ बात न कैर, योत रात- दिन रैंदा छन. फिरोड़ा- फिरोड़ लगीं रैंद, इना दिन चैंदा छन.. जतगा छीं...
नौ दिसंबर 2020 को लोकसाक्ष्य के माध्यम से युवा लेखिका एवं कवयित्री किरन पुरोहित ने अलकनंदा नदी को पत्र लिखा...
कैसे गद्दारों और मक्कारों की कामयाब ये चाल हुई। बही थी नदिया शोणितों की और धरा भी लाल हुई। क्षत...
हिन्दी राष्ट्रवाद के हर पन्ने पर, हिन्दी का साम्राज्य हो । भटक रही पहचान हमारी, उठो उसका सम्मान हो ।।...
तपोवन की व्यथा जिन बर्फ की चोटियों का दीदार करने, सैलानी आते थे यहाँ सैर करने। डर रहे हैं काँप...
