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July 12, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-अब हम फैसला करेंगे फ्री बी क्या है, अगली सुनवाई 22 अगस्त को

चुनावों के दौरान फ्री बी या रेवड़ी कल्चर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि हम फैसला करेंगे कि फ्री बी क्या है। अब यह परिभाषित करना होगा कि फ्रीबी क्या है। जनता के पैसे को कैसे खर्च किया जाए। हम परीक्षण करेंगे कि क्या सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल, पीने के पानी तक पहुंच, शिक्षा तक पहुंच को फ्रीबी माना जा सकता है? हमें यह परिभाषित करने की आवश्यकता है कि एक फ्रीबी क्या है। क्या हम किसानों को मुफ्त में खाद देने से रोक सकते हैं। मुफ्त शिक्षा, सार्वभौमिक शिक्षा का वादा, चिंता सार्वजनिक धन खर्च करने का सही तरीका है। क्या कोई मुफ्त लंच हो सकता है। सुझावों में से एक है कि राज्य के राजनीतिक दलों को मतदाताओं से वादे करने से नहीं रोका जा सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार यानि 22 अगस्त को होगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कोर्ट ने सभी पक्षों का तर्क सुना और उनसे सुझाव मांगे हैं। कोर्ट अब इस मामले पर सोमवार को अपना फैसला सुनाएगा। मामले की सुनवाई सीजेआई एनवी रमना की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच कर रही है। इसमें जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस हिमा कोहली शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने एक बार फिर विशेषज्ञ कमेटी बनाने की मांग की, लेकिन बेंच ने कहा कि पहले अन्य के सुझाव पर भी गौर करेंगे। सीजेआई ने कहा कि सवाल ये है कि वैध वादा क्या है? क्या फ्रीबीज है और क्या वो कल्याणकारी राज्य के लिए ठीक है? सीजेआई ने आगे कहा कि जो याचिका के पक्ष में हैं या खिलाफ हैं, वो अपना सुझाव दें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इससे पहले आम आदमी पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर इस मुद्दों पर विचार के लिए विशेषज्ञ कमिटी के गठन की मांग का विरोध किया था। हलाफ़नमे में कहा गया था कि चुनावी भाषणों पर कार्यकारी या न्यायिक रूप से प्रतिबंध लगाना संविधान के अनुच्छेद 19 1A के तहत फ्रीडम ऑफ स्पीच की गारंटी के खिलाफ है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त उपहार देने का वादा करना गंभीर मुद्दा है। इसके बजाय बुनियादी ढांचे पर राशि खर्च की जानी चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

हालांकि, इस याचिका के बाद दिल्ली और पंजाब सरकार ने एक हलफनामा दायर की और तर्क दिया कि योग्य और वंचित जनता के लिए चलाए जा रहे सामाजिक-आर्थिक कल्याण के योजनाओं को मुफ्त उपहार के रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता। साथ ही दोनों सरकारों ने यह भी आरोप लगाया कि अश्विनी उपाध्याय कानूनी तरीके से एक राजनीतिक एजेंडा हासिल करने की कोशिश कर रेह हैं। केन्द्र सरकार ने भी इसपर कोई स्पष्ट रूप से टिप्पणी नहीं की है और कहा है कि इसपर डिबेट होनी चाहिए।