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July 28, 2026

नेतृत्व परिवर्तन पर कवि सोमवारी लाल सकलानी की दो कविता-यह दक्खण पंथ भी देख लिया और तीरथ भी अब डोल उठे

कवि एवं साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी, निशांत सेवानिवृत शिक्षक हैं।

यह दक्खण पंथ भी देख लिया जी !

न चुनाव हुए – न राजा हारे,
बिना जंग ‘सूबे’ दार हैं मारे!
दस वर्ष में इक्कीस हो गए,
आजीवन के विष्णु बन गए !

बिना गोल किए प्रतिद्वंदी जीते,
गनीमत मानो, फीफा नहीं खेले।
लघु प्रदेश – क्या सोच सूक्ष्म है ?
या क्या कुर्सी ही महा – मोह है ?

तीर्थ – स्नान ‘सूबे’ दार गए हैं,
त्रिदेव इंद्र तक वंचित कुंभ रहें हैं!
दक्खन पंथ भी देख लिया जी,
देवभूमि को क्या वरदान मिला जी!

क्या इसी लिए उत्तराखंड बना है ?
सत्ता सुख ठेका-नेता बदल दिया है!
अब चैन से आसान बैठे रहना जी,
तख्त उतर – पेंशन खाते रहना जी।

धन्य नारायण ! पांच साल बिताए,
पर देवताओं ने ,तुम बहुत संताये!
सुनो ! कभी ‘सूबे’ दार नही बनना।
सदा लोक सिफाई बन सेवा करना।

राजनीति का चढ़ता – गिरता पारा ,
आम आदमी – सदा मुसीबत मारा।
राज कुलीन -तंत्र- लोक तो है नारा,
यहां बिना युद्ध के भी मरता राजा !

तीरथ भी अब डोल उठे !

केवल टीका लगवाने को,
तीर्थ मुख्य दरबार लगे !
पंडित चंद्र भुवन जी द्वारा,
तीर्थ आशीर्वाद लिए !

समझे ना कलयुग महिमा,
क्यों नतमस्तक नहीं हुए ?
पापी कल जुग महा आपदा,
तीरथ भी अब डोल गए।

महा ईश अब यहां आएंगे,
रमा ईश या कोई धन दीश !
एक वर्ष की बात और है,
आ जायेंगे फिर हरि ईश ।

कुछ दिन देव सुबोध भी देखो !
या अनिल विजय महाराज ।
देवभूमि है यहां देव हैं रहते ,
मिल सकते हैं यतीश्वर नाथ !

कवि का परिचय
कवि एवं साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी, निशांत सेवानिवृत शिक्षक हैं। वह नगर पालिका परिषद चंबा के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर हैं। वर्तमान में वह सुमन कॉलोनी चंबा टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में रहते हैं। वह वर्तमान के ज्वलंत विषयों पर कविता, लेख आदि के जरिये लोगों को जागरूक करते रहते हैं।