तेल सप्लाई रुकी, रोशनी नहीं, हॉर्मुज़ संकट के बीच हवा और धूप ने संभाली दुनिया की बिजली
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य पर आई रुकावट ने दुनिया की ऊर्जा सप्लाई को झकझोर दिया। यह वही रास्ता है, जहां से वैश्विक एलएनजी का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे हर संकट में एक पुराना डर लौट आता है, क्या दुनिया फिर से कोयले की तरफ भागेगी? इस बार कहानी अलग निकली। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर काम करने वाली संस्था के नए विश्लेषण “Global fossil power generation drop after Hormuz March 2026” के मुताबिक, संकट के पहले ही महीने में दुनिया में फॉसिल फ्यूल से बनने वाली बिजली घट गई। कुल मिलाकर करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। इसमें गैस आधारित बिजली उत्पादन चार प्रतिशत तक गिर गया, जबकि कोयला लगभग स्थिर रहा। यह गिरावट किसी आर्थिक सुस्ती का नतीजा नहीं थी। बिजली की मांग बनी रही। फर्क इस बात से आया कि कमी किसने पूरी की। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जवाब साफ है कि इस कमी को सोलर और विंड के जरिये पूरा किया जा रहा है। रिपोर्ट बताती है कि मार्च में सोलर उत्पादन 14 प्रतिशत और पवन ऊर्जा आठ प्रतिशत बढ़ी। यही बढ़त फॉसिल फ्यूल की गिरावट को संतुलित कर गई। दुनिया के बड़े बिजली बाजारों, जैसे अमेरिका, भारत, यूरोप और तुर्किये में कोयले से बनने वाली बिजली घटी। भारत और अमेरिका में खास तौर पर सोलर ऊर्जा की तेज़ बढ़त इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह रही। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यहां एक अहम बात सामने आती है, जो इस पूरे नैरेटिव को बदल देती है। संकट के बाद कई जगह यह कहा गया कि दुनिया “कोल कमबैक” की ओर बढ़ रही है। वहीं, यह विश्लेषण इस धारणा को खारिज करता है। डेटा में कहीं भी कोयले की वापसी का स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। दरअसल, कोयला पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता के करीब इस्तेमाल हो रहा था। गैस महंगी होने के बावजूद कोयले के पास उतनी अतिरिक्त गुंजाइश नहीं थी कि वह अचानक पूरी कमी भर सके। ऐसे में जो जगह बनी, वह सोलर और विंड ने भरी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह कोई संयोग नहीं
2025 में दुनिया ने रिकॉर्ड स्तर पर सोलर और विंड क्षमता जोड़ी। इतनी कि यह नई क्षमता अकेले ही उस एलएनजी से दोगुनी बिजली पैदा कर सकती है, जो हॉर्मुज़ से होकर गुजरती थी। यानी संकट आने से पहले ही एक विकल्प तैयार था।
कोयले के मोर्चे पर भी कहानी अलग है। समुद्री कोयले की ढुलाई 3 प्रतिशत गिर गई, जो 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। चीन और भारत जैसे बड़े बाजारों में भी कोयले की शिपमेंट घटी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
हालांकि कुछ अपवाद भी हैं। चीन के तटीय इलाकों में महंगी गैस के चलते कोयले की तरफ सीमित शिफ्ट देखा गया, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया में परमाणु उत्पादन कम होने के कारण कोयले का इस्तेमाल बढ़ा। यह बढ़ोतरी वैश्विक ट्रेंड को नहीं बदलती। इस पूरे विश्लेषण का एक बड़ा संकेत यह है कि ऊर्जा संकट अब सिर्फ झटका नहीं देता, दिशा भी तय करता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कई देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ बढ़ाए कदम
रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि संकट के बीच कई देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए। भारत ने हर साल 50 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा के लिए बोली प्रक्रिया जारी रखने की नीति दोहराई। फ्रांस ने इलेक्ट्रिफिकेशन को तेज़ करने की योजना बनाई। तुर्किये ने 2035 तक 80 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा। यानी कहानी सिर्फ गिरावट या बढ़त की नहीं है, यह प्राथमिकताओं के बदलने की कहानी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए एक विशेषज्ञ की बात काफी है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि फॉसिल फ्यूल संकट का सबसे स्थायी असर यह नहीं होता कि हम पुराने ईंधन की तरफ लौटते हैं, बल्कि यह होता है कि हम विकल्पों को तेज़ी से अपनाते हैं। मार्च 2026 का डेटा यही दिखाता है। जब सप्लाई रुकी, तो दुनिया ने अंधेरे से बचने के लिए कोयले की तरफ नहीं, सूरज और हवा की तरफ देखा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन इसका मतलब गहरा है। ऊर्जा की दुनिया में अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ईंधन कहां से आएगा। सवाल यह है कि क्या हम ऐसे सिस्टम बना पा रहे हैं, जो संकट के समय भी टिके रहें। हॉर्मुज़ संकट ने यह दिखा दिया कि जवाब धीरे-धीरे बदल रहा है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


