कुमाऊंनी होली गीत: बचो बचो, लेखक-ललित मोहन गहतोड़ी
बचो बचो
अच्हारे कलयुग आ रौ छ।। टेक।।
बचो बचो शहर के लोग… कलयुग रौ छ
भ्राता सखा और बंधु बांधव।। 2।।
स्वार्थ के परमोह… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
माता पिता की आज्ञा छोड़ी।। 2।।
छोड़े बात विचार… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
संध्या वंदन भूल गए हैं।। 2।।
भूले जग की रीत… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो… (जारी, अगले पैरे में देखिए)
गांव छोड़ सब शहर को निकले।। 2।।
छोड़े तीज त्योहार… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
घर जंगल भी बंजर पड़ गए।। 2।।
टूटे संगल द्वार… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
आंख के अंधे कान से बहरे।। 2।।
बढ़ रहे हैं कई रोग… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
कम से कम है बातचीत अब।। 2।।
फोन से चिपके लोग… कलयुग आ रौ छ… बचो बचो…
रचनाकार का परिचय
रचनाकार ललित मोहन गहतोड़ी काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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