अशोक आनन की कविता- सूरज ताका-झांकी करता
मेघों की खिड़कियों से
सूरज
ताका-झांकी करता ।
धूप की फरिया
लगे फटी सी।
जाड़े से वह
लुटी लुटी सी।
पेड़ों की फुनगियों से
सूरज
ताका-झांकी करता।
पेड़ों को –
हवा झकझोरती।
भुंसारे से
वह नींद तोड़ती। (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
कोरों की कनखियों से
सूरज
ताका-झांकी करता।
गांव – शहर
अब उनींदे लगते।
उघड़ा बदन
लगें वे ढंकते।
ठूंठों की टहनियों से
सूरज
ताका-झांकी करता।
बर्फ़ की दरी
बिछी झील पर।
मस्ती छाई
भोर भील पर।
फूसों की बस्तियों से
सूरज
ताका-झांकी करता।
कवि का परिचय
अशोक आनन
जूना बाज़ार, मक्सी जिला शाजापुर मध्य प्रदेश।
Email : ashokananmaksi@gmail.com
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