युवा कवयित्री अंजली चंद की कविता- प्रदर्शनकारी नहीं हैं, छात्र हैं हम
प्रदर्शनकारी नहीं हैं
छात्र हैं हम
राजनीति नहीं चाहते
न्याय चाहते हैं हम
कई सालों से भरोसा किया है
इसीलिए देश अपना तुम्हें सौंपा है।
तुम अब हमारे भटकते
भरोसे को रास्ता दिखलाओ न
हिस्सों में टूट रहा है देश का
अनभिज्ञ युवा
नेतृत्व हमारा करने
आओ ना। (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
संविधान में वर्णित हर भाषा – परिभाषा
जो हमने पढ़ी है,
उसे श्मशान होने से
संरक्षित कराओ न
विश्व में प्रसिद्ध लोकतंत्र हमारा
इसे अपने ही देश में घुटने से
उभार लाओ न।
प्रदर्शनकारी नहीं है
युवा हैं हम
राजनीति नहीं चाहते
न्याय चाहते हैं हम।
हाथ में तिरंगा, संविधान थामे
गांधीवादी तरीके से
हक ही तो मांगे हैं हम,
चलो ठीक है हठ हमारा
धूमिल आपके वर्चस्व को ठहरा गया है,
इसीलिए लाठियों से युवाओं को निरन्तर पीटा गया है,
युवा अपने ही मित्र प्रशासन से पिट जाएं
प्रदर्शनकारी से संबोधित कर दिया जाए,
नेतृत्व हमारा कैसे होगा?
भीड़ पर संयम कैसे होगा ? (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
आजाद देश के गुलाम युवा
बेरोज़गारी की मार झेलते युवा
एक मिनट की देरी में जब परीक्षा छूट जाती है
सालभर की मेहनत रेत सी फिसल जाती है,
क्यों ख़ामोश है सत्ता के हितकारी?
क्यों न सवाल पूरछे युवा?
गहराई से समझो ना
एक पारदर्शिता ही तो माँगे है युवा,
भरोसा किया
इसीलिए तो टूटे हुए हैं युवा,
लोकतंत्र पारदर्शिता ही तो सिखाता है
अपने कर्तव्य का निर्वहन करो न,
भर्ती घोटाला आपकी ही असमर्थता है
इसे स्वीकार कर
रणनीति अपनी सुधारों न,
प्रदर्शनकारी नहीं
छात्र हैं हम
राजनीति नहीं चाहते
न्याय चाहते हैं हम।।
कवयित्री की परिचय
नाम – अंजली चंद
बिरिया मझोला, खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड।
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