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September 24, 2026

बंजर खेत और गांवों का सूनापन दे रहा पहाड़ के बढ़ते पलायन की गवाही: ललित मोहन गहतोड़ी

उत्तराखंड में चंपावत जिले के सीमांत गांवों में बीते दो दशकों से बढ़ रहा पलायन अब केवल विभागीय आंकड़ों में नहीं, बल्कि गांवों के सूनेपन में साफ झलक रहा है। कभी हरी-भरी फसलों से लहलहाते खेत आज बंजर पड़े हैं। जिन खेतों में कभी मडुवा, झंगोरा और गहत की फसल लहलहाती आज वहां घास के चरागाह बन गए हैं। खेतों में बड़ी-बड़ी कंटीली झाड़ियां और झरमुले उग आए हैं। गांव से लोग कितनी दूर जा चुके हैं बंद पड़े मकान और उसके आसपास उगी झाड़ियां इस बात की गवाही दे रही हैं। खेती नाम से पड़े खेतीगाड़, खेतीखान, खेती, बेलखेत, सिमलखेत आदि गावों में तक अब खेती सिमट कर रह गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

चंपावत जिले के पाटी, बाराकोट, लोहाघाट से लेकर चंपावत तक के अधिकांश गांवों में यही तस्वीर देखने को मिल रही है। पहले की अपेक्षा गांवों में अब सड़क सुविधा बढ़ रही है। इधर पीएमजीएसवाई के तहत गांव-गांव तक सड़क पहुंचाई जा रही है। विडंबना यह है कि इन सुविधाओं का लाभ लेने के लिए गांवों में लोग ही नहीं हैं। जिले के अधिकांश गांवों के 50 से 70 प्रतिशत घरों पर ताले लटके हैं। बंद पड़े मकानों के बीच कुछ परिवारों में केवल बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे ही रह गए हैं। युवा रोजगार और बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए आसपास के नगरीय क्षेत्रों सहित हल्द्वानी, टनकपुर, देहरादून और दिल्ली जैसे शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

ग्रामीणों का कहना है कि गांव में खेती करने वाला कोई नहीं बचा है। जंगली जानवरों का आतंक भी खेती न करने की एक बड़ी वजह बन गया है। बंदरों और सूअरों के कारण फसल बर्बाद हो रही है। ऐसे में लोगों ने खेतों को बंजर छोड़ना ही बेहतर समझा है। धीरे-धीरे खेत झाड़ियों में तब्दील हो गए हैं। सामाजिक चिंतकों का मानना है कि यदि 20-30 साल पहले यह सड़कें गांव-गांव तक पहुंच जातीं तो पलायन की यह स्थिति नहीं बनती। पलायन से पहले सड़क बन जाती तो गांव के लोग गांव में ही रहकर रोजगार कर अपनी उपज को बाजार तक ले जा सकते थे। लेकिन सड़क सुविधा बढ़ने से पहले ही पलायन ने यहां दस्तक दे दी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अब स्थिति यह है कि गांव में सड़क, बिजली और भरपूर मात्रा में पानी की सुविधा तो है लेकिन घरों में रहने वाले लोग यहां से पलायन कर गए हैं। इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या भी लगातार घट रही है। शिक्षा विभाग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक विगत एक दशक में चंपावत जिले में 70 से ज्यादा प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय पूरी तरह से बंद हो गये हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसके साथ ही पलायन के चलते गांव का सामाजिक ताना-बाना ही बिखरकर रह गया है। पहले जहां मेले, खेल और त्योहारों में गांव के सभी लोग एक साथ जुटकर आयोजन को संपन्न कराते आज वहां अजीब सा खालीपन और सन्नाटा पसरा नजर है। प्रवासियों के बिना गांवों का यह सूनापन पहाड़ के भविष्य के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अब खेतीगाड़ भी बन जाएगा पूरी तरह से गैर आबाद गांव
चंपावत जिले के मानेश्वर कस्बे की तलहटी में बसा ग्राम पंचायत मझेड़ा का खेतीगाड़ गांव खेती के लिए प्रसिद्ध रहा है। वर्ष 2000 से पलायन के चलते इस गांव में केवल एक परिवार रह रहा था, जो 2025 के बाद मानेश्वर में आकर बस गया है। गांव के पनघट और खेत पलायन के चलते बंजर पड़ गए हैं। घरों और उसके आसपास घास फूस उग आई है। पलायन कर चुके मुखिया तारा मोहन का कहना है गांव में अब कोई नहीं रहता। इसलिए पलायन करना भी उनकी मजबूरी हो गई है। उन्होंने बताया कि गांव का रास्ता तक अब चलने लायक नहीं रह गया है।

लेखक का परिचय
ललित मोहन गहतोड़ी उत्तराखंड में काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।