सेहत की भाषा में क्लाइमेट की करोगे बात, तो होगा दोगुना असर
जलवायु परिवर्तन को समझाने के कई तरीके हैं। तापमान, कार्बन, ग्लेशियर, समुद्र को लेकर इसे समझा जाता है। अब एक नई स्टडी कहती है कि अगर आप क्लाइमेट को सेहत की भाषा में समझाते हैं, तो लोग सिर्फ समझते नहीं, प्रतिक्रिया भी देते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Wellcome Trust के लिए Climate Opinion Research Exchange की ओर से किए गए एक बड़े अध्ययन में पाया गया है कि जब लोगों को बताया जाता है कि जलवायु परिवर्तन उनकी सेहत को कैसे प्रभावित कर रहा है। एसे में लोग सरकार से कार्रवाई की मांग करने में दोगुना ज्यादा सक्रिय होते हैं। यह रिसर्च ब्राज़ील, भारत, जापान और दक्षिण अफ्रीका में 30,000 से अधिक लोगों पर आधारित है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस स्टडी का सीधा मतलब है। क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ पर्यावरण की कहानी नहीं रह गया है, यह लोगों के शरीर, उनकी सांस, उनके बच्चों की सेहत की कहानी बन चुका है। रिसर्च के लीड एनालिस्ट डस्टिन गिलब्रेथ कहते हैं कि डेटा साफ है। जैसे ही लोगों को समझ आता है कि जलवायु परिवर्तन उनकी सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, वे सरकार से ज्यादा कदम उठाने की मांग करते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
चारों देशों में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग पहले से ही जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित हैं, और लगभग तीन-चौथाई लोगों को यह एहसास है कि यह उनकी सेहत को प्रभावित कर रहा है। लेकिन जैसे ही इस कनेक्शन को और साफ तरीके से बताया जाता है, समर्थन और तेज हो जाता है। भारत में यह चिंता सबसे ज्यादा हवा और स्वास्थ्य सेवाओं के इर्द-गिर्द दिखती है। 66 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि सरकार क्लाइमेट पर और काम करे, जबकि 74 प्रतिशत लोग मानते हैं कि स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर से बचाने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एम्स दिल्ली में कम्युनिटी मेडिसिन से जुड़े डॉ. हर्षल रमेश साल्वे कहते हैं कि एयर पॉल्यूशन भारत में क्लाइमेट संकट का सबसे दिखने वाला चेहरा है। इसके असर बहुत गंभीर हैं, सांस की बीमारियों से लेकर दिल की समस्याओं और बच्चों के विकास तक। इसे पब्लिक हेल्थ और क्लाइमेट दोनों के नजरिए से तुरंत संबोधित करना होगा। यही बात लोगों के अनुभव में भी दिखती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वॉरियर मॉम्स की संस्थापक भवरीन कंधारी कहती कि माता-पिता की चिंता एक जैसी है। यह हवा हमारे बच्चों के फेफड़ों के साथ क्या कर रही है, वे इस गर्मी को कैसे झेलेंगे, और जब बाढ़ या हीटवेव के दौरान अस्पताल भर जाते हैं तो क्या होगा। ये कोई दूर की बातें नहीं हैं, ये रोज़ की हकीकत है। स्टडी यह भी बताती है कि किन मुद्दों से लोगों की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ती है। हीटवेव, खाने और पानी की कमी, और बच्चों की सेहत। यानी क्लाइमेट का असर वहां सबसे ज्यादा महसूस होता है, जहां जिंदगी सबसे ज्यादा नाजुक होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
Global Climate and Health Alliance की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. जेनी मिलर इसे सीधे शब्दों में कहती हैं कि जलवायु संकट अब एक हेल्थ क्राइसिस बन चुका है। और जब तक हम इसे उसी गंभीरता से नहीं देखेंगे, तब तक समाधान अधूरा रहेगा। इस स्टडी का एक और अहम पहलू है। यह सिर्फ लोगों की सोच नहीं बदलती, बल्कि नीतियों के समर्थन को भी प्रभावित करती है। जैसे नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, और जलवायु से प्रभावित देशों के लिए वित्तीय मदद। जब लोग इसे अपनी सेहत से जोड़कर देखते हैं, तो वे इन कदमों का ज्यादा समर्थन करते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वेलकम ट्रस्ट की सलाहकार नेहा देवान कहती कि यह एक मौका है। हेल्थ के नजरिए से दी गई क्लाइमेट जानकारी न सिर्फ प्रासंगिक है, बल्कि ज्यादा असरदार भी है। अब जरूरत है कि इस समझ को ठोस नीतियों में बदला जाए। कहानी यहां साफ हो जाती है। क्लाइमेट चेंज को अगर आप डिग्री सेल्सियस में समझाएंगे, तो शायद वह दूर लगेगा। लेकिन अगर आप उसे सांस, बुखार, पानी और बच्चों की सेहत में समझाएंगे, तो वह हर घर की कहानी बन जाएगा। शायद तभी, बदलाव की मांग भी उतनी ही तेज होगी।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


