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October 22, 2026

सुप्रीम कोर्ट का फैसलाः सिनेमाघरों में चलेगी मालिक की मर्जी, वह कोई जिम नहीं कि तंदूरी चिकन, जलेबी…

सिनेमाघरों में बाहर से खाने-पीने की चीजों को ले जाने की इजाजत देने से जम्मू हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा सिनेमा हॉल मनोरंजन की जगह है। सिनेमा हॉल प्रबंधन की निजी संपत्ति है, लिहाजा वहां हॉल के मालिक की मर्जी ही चलेगी। सिनेमा हॉल कोई जिम नहीं जहां आपको पौष्टिक भोजन मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा सिनेमा हॉल प्रबंधन की निजी संपत्ति है। सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। इस आदेश में हाईकोर्ट ने बाहरी खाना पीना हॉल में ले जाने की इजाजत दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को अनुचित बताते हुए कहा कि ये आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सिनेमाघरों में छोटे बच्चों के लिए खाना व सभी के पीने का स्वच्छ पानी वहां मुफ्त उपलब्ध कराने के आदेश पहले से ही दे रखे हैं। कोर्ट ने कहा कि ये दर्शकों का अधिकार और इच्छा है कि वो किस थिएटर में कौन सी फिल्म देखने जाएं। वैसे ही हॉल प्रबंधन को भी अधिकार है कि वहां क्या क्या नियम बनाने हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सुप्रीम कोर्ट जम्मू कश्मीर के एक सिनेमा हॉल में बाहर से लाए गए भोजन पर पाबंदी लगाई जाने के खिलाफ जम्मू कश्मीर सिनेमा हॉल ऑनर्स एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कई दिलचस्प टिप्पणियां कीं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सीजेआइ (CJI) ने कहा कि कोई सिनेमा घर में जलेबी लेकर जाना चाहे तो सिनेमा हॉल प्रबंधन उसे ये कहते हुए मना कर सकता है कि अगर जलेबी खाकर दर्शक ने सीट से अपने चाशनी वाली अंगुलियां पोंछ ली तो खराब हुई सीट का खर्च कौन देगा? इसी तरह लोग तंदूरी चिकन लेकर आ सकते हैं। बाद में शिकायत हो सकती है कि उनकी हड्डियां वहीं छोड़ जाते हैं। उससे भी कुछ लोगों को परेशानी होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

चीफ जस्टिस ने कहा कि जब टीवी पर 11 बजे के बाद कुछ ‘खास’ वर्ग की फिल्मों के प्रसारण का नियम बनाया गया तो उसका मकसद ये था की बच्चों के सोने के बाद वयस्क लोग वो फिल्में देख सकें। जब वो बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर ऐसी PIL सुन रहे थे। उन्होंने दूसरे जज से कहा था कि देर रात में वयस्क तो खाना पीना खा पी कर सो जाते हैं। बच्चे ही जागे रहते हैं। मैंने जज से पूछा कि क्या उन्होंने कभी 11 बजे के बाद फिल्म देखी है। जज ने कहा कि कभी नहीं। बहुत देर हो जाती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

दरअसल, दो वकीलों ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के 18 जुलाई 2018 को दिए फैसले को यहां सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। बाहरी खाद्य पदार्थ सिनेमा हॉल में ले जाने पर पाबंदी लगाते हुए नोटिस चस्पा कर दिए थे। सुरक्षा कर्मियों ने रोका और दलील दी कि थिएटर वाले अपने परिसर में ही बिकने वाले खाद्य सामान ही खरीद कर खाने को मजबूर करते हैं। वो सामान पौष्टिक हों ये कोई जरूरी नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस पाबंदी से का नतीजा ये हुआ है कि दर्शक वहीं बिकने वाले सामान खरीदने को मजबूर होते हैं।

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