समर्थ पोर्टल हुआ असमर्थ, छात्र परेशान, कॉलेजों में छात्रों का टोटा, दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे छात्र, सरकार नींद मेंः डॉ सुनील अग्रवाल
डॉ. सुनील अग्रवाल
निजी कॉलेज एसोसिएशन उत्तराखंड के अध्यक्ष डॉ सुनील अग्रवाल ने राज्य के महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर सरकार और शिक्षा विभाग पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि समर्थ पोर्टल के माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया सिर्फ छात्रों को परेशानी का सबब सिद्ध हुई है। समर्थ पोर्टल छात्रों के लिए असमर्थ बन गया है। वहीं कॉलेजों में छात्रों का टोटा बना हुआ है। असमंजस की स्थिति में छात्र उत्तराखंड से पलायन कर दूसरे राज्यों के कॉलेजों में प्रवेश लेने को मजबूर हैं। वहीं सरकार और उच्च शिक्षा विभाग गहरी नींद में सोए हुए हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डॉ. सुनील अग्रवाल ने कहा कि श्री देव सुमन विश्वविद्यालय की ओर से पहले एक मई से 30 जून तक प्रवेश प्रक्रिया के लिए समर्थ पोर्टल खोला गया था। उसके बाद प्रवेश प्रक्रिया पूर्ण न होने के कारण एक जुलाई से 12 जुलाई तक पुनः इसे खोला गया। इसके बाद 14 जुलाई से 21 जुलाई तक, 21 जुलाई से 10 अगस्त तक, फिर 10 अगस्त से 18 अगस्त तक एवं उसके उपरांत 19 अगस्त से अब 26 अगस्त तक समर्थ पोर्टल में पंजीकरण की तिथि निश्चित की गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डॉ सुनील अग्रवाल ने कहा कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों को पिछले वर्षों के अनुभव के अनुसार पहले से ही मालूम है कि प्रवेश प्रक्रिया अगस्त माह तक चलती है। इसके बावजूद भी बार-बार टुकड़ों में समर्थ पोर्टल खोलने और बंद करने का खेल क्यों किया जाता है। इसके कारण छात्रों में असमंजस की स्थिति बनी रहती है। हर वर्ष समर्थ पोर्टल को बार-बार खोलने और बंद करने का खेल चलता है। हर बार प्रत्येक तिथि पर यह घोषणा की जाती है कि इसके बाद पंजीकरण नहीं होंगे। इसके कारण छात्र निजी विश्वविद्यालयों या अन्य राज्यों की ओर प्रवेश के लिए पलायन कर जाते हैं। वहीं, उत्तराखंड के अधिकांश कॉलेजों में सीट खाली रह जाती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डॉ. सुनील अग्रवाल ने कहा कि जब प्रत्येक वर्ष बार-बार पोर्टल खोलने और बंद करने के खेल के कारण प्रवेश प्रक्रिया बाधित होती रहती है, तो इसको एक बार ही एक जून से 31 अगस्त तक लगातार खोले रखने की घोषणा की जाती है। एक बार ही समर्थ पोर्टल लगातार प्रवेश के लिए खोलने से छात्रों को सुविधा रहेगी। इसके विपरीत हर वर्ष बार-बार समर्थ पोर्टल खोलने और बंद करने के खेल से जाहिर होता है कि अधिकारी छात्र हितों के प्रति संवेदनशील नहीं है। या फिर निजी विश्वविद्यालयों को लाभ पहुंचाने की मंशा से ऐसा करते हैं।
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