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September 7, 2026

नेपाल को जलवायु न्याय चाहिए, साथ ही अपने फैसलों का हिसाब भीः मृणमय चटराज

नेपाल को जलवायु न्याय चाहिए। बिल्कुल चाहिए। जिस देश का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में हिस्सा करीब 0.1 फीसदी है, अगर वही बदलती जलवायु की भारी कीमत चुका रहा है, तो दुनिया के बड़े प्रदूषक देशों से सवाल पूछना उसका हक है। नेपाल की हालिया तबाही के बाद एक दूसरा सवाल भी पूछना पड़ेगा। क्या इस त्रासदी में सिर्फ जलवायु परिवर्तन का हाथ था? सवाल थोड़ा असहज है। शायद होना भी चाहिए। क्योंकि कभी-कभी कोई आपदा सिर्फ आसमान से नहीं आती। उसका कुछ हिस्सा हमारी अपनी जमीन पर लिए गए फैसलों में पहले ही तैयार हो चुका होता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नदियों को बिजली उत्पादन के लिए बनाया विकास की धुरी
नेपाल ने अपनी तेज बहती नदियों को विकास की धुरी बनाया। बिजली पैदा करनी थी। ऊर्जा सुरक्षा बढ़ानी थी। भारत और बांग्लादेश को बिजली बेचकर विदेशी मुद्रा कमानी थी। यह रणनीति कुछ हद तक सफल भी हुई। नेपाल में बिजली उत्पादन 2020 में करीब 6.1 टेरावॉट-घंटा था। 2024 में यह बढ़कर करीब 11 टेरावॉट-घंटा हो गया। देश ने 2035 तक 28,500 मेगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है। इसमें करीब 15,000 मेगावॉट बिजली निर्यात के लिए लक्षित है। बिजली निर्यात अब नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025-26 में बिजली निर्यात से आय सालाना आधार पर करीब 68 फीसदी बढ़कर 29.32 अरब नेपाली रुपये पहुंच गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

बड़े जलाशय की बजाय प्राकृतिक प्रवाह पर दिया ध्यान
कागज पर यह विकास की एक अच्छी कहानी है, लेकिन पहाड़ों में विकास की कहानी सिर्फ यह देखकर नहीं लिखी जा सकती कि कितनी बिजली पैदा हुई और कितने रुपये कमाए गए। यह भी पूछना पड़ेगा। यह बिजलीघर आखिर खड़ा कहां है? नेपाल की करीब 90 फीसदी जलविद्युत क्षमता रन-ऑफ-रिवर मॉडल पर आधारित है। यानी पानी को बड़े जलाशय में रोकने के बजाय नदी के प्राकृतिक प्रवाह से बिजली बनाई जाती है। सामान्य परिस्थितियों में यह मॉडल काम करता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यदि नदी सामान्य ना रहे
अब सवाल ये उठता है कि अगर नदी ही सामान्य न रहे तो? अगर एक साथ असाधारण मात्रा में पानी, पत्थर, मिट्टी और मलबा पहाड़ों से नीचे उतरने लगे तो? हाल की तबाही ने इन सवालों को बहुत वास्तविक बना दिया। बाढ़ और भूस्खलन से त्रिशूली और भोटेकोशी जैसे नदी बेसिनों में भारी नुकसान हुआ। 12 चालू जलविद्युत परियोजनाएं और 15 निर्माणाधीन परियोजनाएं प्रभावित हुईं। करीब 901 मेगावॉट क्षमता प्रभावित हुई। इसमें लगभग 431 मेगावॉट चालू परियोजनाओं की और 470 मेगावॉट निर्माणाधीन परियोजनाओं की क्षमता थी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

आपदा से बिजली क्षमता को नुकसान
नेपाल की कुल स्थापित बिजली क्षमता करीब 4,120 मेगावॉट है। यानी नुकसान देश की कुल बिजली क्षमता के लगभग दसवें हिस्से के बराबर था। यहां जलवायु परिवर्तन ने खतरे को बढ़ाया हो सकता है। सवाल यह भी है कि हमने उस खतरे के सामने अपना बुनियादी ढांचा कितना असुरक्षित छोड़ दिया था। हिमालय कोई सामान्य निर्माण क्षेत्र नहीं है। यहां पहाड़ काटना, विस्फोट करना, गहरी सुरंगें बनाना और नदियों के आसपास बड़े बुनियादी ढांचे खड़े करना सिर्फ इंजीनियरिंग का मामला नहीं है। इसके साथ भूगोल, पारिस्थितिकी और जलवायु जोखिम भी जुड़े हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

परियोजनाओं की योजना में क्यों नहीं किया गया बदलाव
ग्लेशियरों के पीछे हटने और ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे को लेकर वर्षों से अध्ययन होते रहे हैं। चेतावनियां भी सामने आती रही हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हमें आपदा का पता क्यों नहीं था। सवाल यह होना चाहिए कि हमें खतरे का पता था, तो हमने अपनी परियोजनाओं की योजना कितनी बदली? क्या बदलती जलवायु और बढ़ते ग्लेशियल झील बाढ़ के जोखिम को परियोजनाओं के डिजाइन और जोखिम आकलन में पर्याप्त जगह मिली? क्या हमने पुराने जलवायु अनुमानों के आधार पर नए बुनियादी ढांचे खड़े कर दिए? इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, लेकिन इन्हें पूछना जरूरी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

पहले से मौजूद जोखिम को बड़ा कर देता है जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन किसी जगह को अचानक जोखिमपूर्ण नहीं बनाता। कई बार वह पहले से मौजूद जोखिम को और बड़ा कर देता है। जब हम उसी जगह पर भारी बुनियादी ढांचा खड़ा करते हैं, तो नुकसान की कीमत भी बढ़ जाती है। यह सिर्फ नेपाल की कहानी नहीं है। नेपाल में जो हुआ, वह सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इन देशों के सामने भी मुश्किल सवाल
भूटान में जलविद्युत बिजली निर्यात अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। मध्य एशिया के ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों में भी नदियों और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर बड़े ऊर्जा प्रोजेक्ट का दबाव बढ़ रहा है। इन देशों के सामने एक मुश्किल सवाल है। ऊर्जा चाहिए। विकास चाहिए। रोजगार चाहिए। विदेशी मुद्रा चाहिए। वहीं, जलवायु बदल रही है। जिस भूगोल पर आज का बुनियादी ढांचा खड़ा किया जा रहा है, वह कल के मुकाबले ज्यादा अनिश्चित हो सकता है। इसलिए सवाल जलविद्युत बनाम विकास का नहीं है। सवाल है कि कहां विकास किया जाए। कितना किया जाए। किस जोखिम को स्वीकार करके किया जाए। नेपाल को जलविद्युत छोड़ने की जरूरत नहीं है। लेकिन अपनी ऊर्जा व्यवस्था को ज्यादा विविध बनाने की जरूरत जरूर है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

तलाशने होंगे दूसरे विकल्प भी
सौर, पवन और बायोमास जैसे विकल्पों में निवेश बढ़ाया जा सकता है। जर्मन तकनीकी एजेंसी जीआईजेड के अध्ययनों के मुताबिक नेपाल की सौर ऊर्जा क्षमता उसकी कुल जलविद्युत क्षमता से करीब दस गुना तक ज्यादा हो सकती है। यह आंकड़ा सिर्फ एक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत की संभावना नहीं बताता। यह एक सवाल भी पूछता है। क्या नेपाल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को एक ही तरह के भौगोलिक जोखिम पर इतना निर्भर रखना चाहता है? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नेपाल ने 2045 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा है। नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात उसके अलग-अलग नीति दस्तावेजों में भी होती रही है। यहां भी कागज और जमीन के बीच का फर्क समझना जरूरी है। 15वीं पंचवर्षीय योजना में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी का लक्ष्य करीब 12 फीसदी के आसपास है। दूसरी तरफ, कुछ नीति दस्तावेजों में 20 फीसदी जैसे ज्यादा महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी सामने आते हैं। लक्ष्य रखना आसान है। उसे जमीन पर उतारना मुश्किल। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

आने वाले जोखिमों पर देना होगा ध्यान
सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए निजी निवेश के लिए बेहतर नियामकीय व्यवस्था चाहिए। बिजली ग्रिड की कमजोरियों को दूर करना होगा। नई ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बनाते समय भविष्य के जलवायु जोखिमों को पुराने आंकड़ों से नहीं, आने वाले जोखिमों को ध्यान में रखकर देखना होगा। कुछ विश्लेषक बेहद संवेदनशील इलाकों में उच्च जोखिम वाली ऊर्जा परियोजनाओं की ज्यादा सख्त जांच और अस्थायी रोक जैसे उपायों की वकालत करते हैं। यह बहस अब सिर्फ पर्यावरण की नहीं है। यह लोगों की सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा की भी बहस है। नेपाल को दुनिया से जलवायु वित्त और जलवायु न्याय मांगते रहना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अपने घर से भी पूछने होंगे सवाल
इसके साथ उसे अपने घर के भीतर भी कुछ कठिन सवाल पूछने होंगे। क्योंकि जलवायु न्याय का मतलब यह नहीं कि विकास के हर फैसले की जिम्मेदारी भी जलवायु परिवर्तन पर डाल दी जाए। दुनिया के बड़े उत्सर्जक देशों को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। नेपाल को भी अपनी। आखिर जलवायु परिवर्तन यह तय नहीं करता कि हम नदी के किनारे क्या बनाते हैं। वह यह भी तय नहीं करता कि पहाड़ को कितना काटा जाए, किस तकनीक का इस्तेमाल हो और किसी परियोजना को किस जोखिम वाले इलाके में मंजूरी मिले। ये फैसले इंसान लेते हैं। जब इंसान फैसले लेता है, तो जिम्मेदारी भी उसकी होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

खतरे को कम करने के लिए तैयार करना होगा बुनियादी ढांचा
अगली बाढ़ को रोकना शायद हमारे हाथ में न हो। अगले भूस्खलन को रोकना भी शायद नहीं। साथ ही यह तय करना हमारे हाथ में है कि अगली बार जब पहाड़ से पानी और मलबा नीचे आए, तो उसके रास्ते में सिर्फ कमजोर infrastructure हो या ऐसा बुनियादी ढांचा भी हो, जिसने उस खतरे को पहले से समझा था। जलवायु संकट हमें मजबूर कर रहा है कि हम सिर्फ यह न पूछें कि आपदा क्यों आई। अब हमें यह भी पूछना होगा। हमने उसे इतना बड़ा होने क्यों दिया?
लेखक के बारे में
मृणमय चटराज डेवलपमेंट सेक्टर में एक सक्रिय कंसल्टेंट हैं। वे विकास, पर्यावरण और उससे जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर काम करते हैं।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।