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June 11, 2026

खेतों में बढ़ती गर्मी छीन रही काम के घंटे, दुनिया की खाद्य सुरक्षा पर नया खतरा, सबसे गर्म साल रह सकता है 2027

दोपहर की धूप में खेत हमेशा कठिन जगह रहे हैं। अब कई देशों में खेत खतरनाक होते जा रहे हैं। कारण ये है कि गर्मी सिर्फ बढ़ नहीं रही, वह शरीर की काम करने की क्षमता छीन रही है। किसान काम की बजाय गर्मी से बचने में भी समय व्यतीत कर रहे हैं। साथ ही बढ़ती गर्मी धीरे-धीरे दुनिया के खाने के घंटे भी कम कर रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ये कहती है नई रिपोर्ट
Energy and Climate Intelligence Unit यानी ECIU की नई analysis के मुताबिक, दुनिया भर में बढ़ता heat stress अब कृषि मजदूरों और किसानों के काम के घंटों को तेजी से कम कर रहा है। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन और food security पर पड़ सकता है। रिपोर्ट कहती है कि 2024 में climate-vulnerable developing countries के agricultural workers ने heat stress की वजह से अनुमानित 216 billion work hours गंवा दिए। यह नुकसान सिर्फ थकान का नहीं है। इसका मतलब खेतों में कम काम, कम productivity और बढ़ता आर्थिक दबाव है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

49 दिनों का हुआ नुकसान
अगर इसे प्रति worker के हिसाब से देखें, तो औसतन लगभग 590 घंटे का नुकसान हुआ। यानी करीब 49 working days। लगभग डेढ़ महीने से ज्यादा का काम गर्मी की वजह से खत्म हो गया। यह स्थिति हर साल खराब हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रति worker heat stress से होने वाला नुकसान हर साल लगभग 4 से 5 घंटे बढ़ रहा है। यानी बढ़ती गर्मी खेतों में काम करने की क्षमता को धीरे-धीरे और तेजी से कम कर रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इन देशों का किया गया अध्ययन
Analysis में भारत, ब्राजील, वियतनाम, केन्या, घाना, दक्षिण अफ्रीका और पेरू जैसे देशों का अध्ययन किया गया। ये वही देश हैं जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा चावल, कॉफी, चाय, कोको, फल और दूसरी कृषि उपज हासिल करती है। अब इन देशों के खेत extreme heat के दबाव में हैं। Lancet Countdown report का हवाला देते हुए analysis बताती है कि 2024 में दुनिया भर में heat exposure की वजह से कुल 640 billion potential work hours lost हुए। यह 2023 से भी ज्यादा था और 1990 के दशक की तुलना में लगभग 98 प्रतिशत अधिक है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सबसे ज्यादा असर कृषि क्षेत्र पर
रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में heat stress से होने वाले कुल work hour losses का लगभग 63.5 प्रतिशत हिस्सा agricultural workers से जुड़ा था। Low Human Development Index वाले देशों में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच जाता है। यानी दुनिया का सबसे vulnerable workforce वही है, जो दुनिया का खाना उगाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

खेत में काम करने वाले भी प्रभावित
ECIU के Head of International Programme Gareth Redmond-King कहते हैं कि climate change अब सिर्फ फसलों को नहीं, बल्कि उन लोगों को भी प्रभावित कर रहा है जो खेतों में काम करते हैं। उनके मुताबिक भारत जैसे देशों में जहां तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा रहा है, वहां बाहर काम करना खतरनाक होता जा रहा है। वे कहते हैं कि इससे स्वास्थ्य, livelihoods और steady food supplies तीनों खतरे में पड़ रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सबसे गर्म साल बन सकता है 2027
World Meteorological Organisation यानी WMO ने आने वाले महीनों में एक शक्तिशाली El Niño बनने की संभावना 80 प्रतिशत बताई है। रिपोर्ट कहती है कि 2027 दुनिया का सबसे गर्म साल बन सकता है। यानी heat stress का संकट और गहरा सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

दुनियाभर के आंकड़ों पर एक नजर
International Labour Organisation यानी ILO के मुताबिक 2024 में दुनिया के 71 प्रतिशत workers excessive heat के संपर्क में थे। एशिया में यह आंकड़ा लगभग 75 प्रतिशत, अरब देशों में 83 प्रतिशत और अफ्रीका में 93 प्रतिशत तक पहुंच गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

फसल को नुकसान पहुंचा सकता है सुपर अल नीनो
भारत की rice farmer और Intercontinental Network of Organic Farmers की President Shamika Mone कहती हैं कि extreme heat खेती को पहले से ज्यादा मुश्किल बना रही है। उनके मुताबिक एक super El Nino फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही छोटे किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। वह कहती हैं कि छोटे किसानों तक climate finance पहुंचाना और nature-friendly farming को बढ़ावा देना जरूरी है। ताकि खेतों का तापमान कम किया जा सके और किसानों को extreme heat से कुछ राहत मिल सके। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

तैयार नहीं हैं संकट से निपटने के लिए
रिपोर्ट यह भी कहती है कि दुनिया के कई vulnerable देशों के पास climate adaptation की क्षमता सीमित है। यानी जिन देशों के किसान सबसे ज्यादा गर्मी झेल रहे हैं, वही उससे निपटने के लिए सबसे कम तैयार हैं। कई सालों तक climate change की चर्चा glaciers, floods और rising sea levels के इर्द-गिर्द होती रही। अब इसकी सबसे बड़ी तस्वीर शायद खेतों में दिखाई दे रही है। जहां किसान काम रोकने के लिए नहीं, बल्कि गर्मी से बचने के लिए छांव ढूंढ रहा है। जहां सूरज सिर्फ मौसम नहीं, productivity तय कर रहा है। जहां बढ़ती गर्मी धीरे-धीरे दुनिया के खाने के घंटे भी कम कर रही है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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