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June 29, 2026

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-घाम-छैल

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-घाम-छैल।

घाम-छैल

मारि- धारि कुछ-नि, घैल ह्वे जिंदगी.
इनि – किलै, घाम – छैल ह्वे जिंदगी..

करणि- धरणि बगैर, निठलि सी ह्वेगे,
आज- कनम कैकी, रखैल ह्वे जिंदगी..

क्वी काम, उर्याणु- पुर्याणु कनम तब,
जब ! खुद ब खुद ही, गैल ह्वे जिंदगी..

भैर – भैरा चलक्वार, ही- न द्याखा,
भितनै कु जुठि-मुठी, मैल ह्वे जिंदगी..

झसकुणू रैंद- यो गात, बात- बेबात,
स्वाचा कनमा, इत्गा डरैल ह्वे जिंदगी..

बग्त- बग्त, ऑखि दिखांदी-घुर्यांदी,
प्यार छोड़ी, कत्गा झग्ड़ैल ह्वे जिंदगी..

‘दीन’ भलु छोड़ी, अपड़ों से मुख मोड़ी,
माना न माना, जिद्दि-हटैल ह्वे जिंदगी..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।