भूपेन्द्र डोंगरियाल का काव्यगीत-आज़कल
आज़कल
झूठ ने रफ़्तार पकड़ी हो रहा है मन विकल।
घुटनों के बल ही रेंगता सच देख लो अब आजकल।।
पालने से पाँव नीचे जब तलक रखता है सच,
झूठ लौटा घूमकर जग झूमता अब आजकल।
इतने करीने से सजा है झूठ का चेहरा यहाँ,
मुफ़लिसी के दौर में सच घूमता अब आजकल।
झूठ की दौलत बढ़ी है गिन रहा वो रात दिन,
सच घुटन के बीच साँसे ढूँढता अब आजकल।
सच सुलह की बात करता झूठ माँगे न्याय अब,
है लड़ाई जीत की वह चूमता अब आजकल।
आइने के सामने चेहरा छिपाता सच यहाँ,
जोड़ता है हाथ सच मजलूम सा अब आजकल।
खिलखिलाते हैं शहर में आशियाने झूठ के,
पाई-पाई गिन रहा सच महरूम सा अब आजकल।
कवि का परिचय
नाम- भूपेन्द्र डोंगरियाल
ग्राम- बल्यूली, जनपद-अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड।
वर्तमान पता- आईटीआई कैम्पस, निरंजनपुर, देहरादून।
भूपेन्द्र डोंगरियाल उत्तराखण्ड राज्य सरकार के सेवायोजन एवं प्रशिक्षण अनुभाग में अनुदेशक के पद पर कार्यरत हैं। वर्जिन साहित्यपीठ के सौजन्य से अभी तक उनकी पाँच ई बुक्स प्रकाशित हो चुकी हैं।
मोबाइल नम्बर-
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8218370117



