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April 17, 2026

चुपचाप बढ़ रहा है समंदर का स्तर, हमारे शरीर तक पहुंच चुका है खतरा

सुबह का वक्त है। किसी तटीय गांव में लोग रोज़ की तरह अपने काम पर निकल रहे हैं। अब पानी पहले से थोड़ा और अंदर तक आ चुका है। खेत का किनारा बदल गया है। कुएं का पानी थोड़ा खारा लगने लगा है। यह बदलाव इतना धीमा है कि दिखता कम है, महसूस ज्यादा होता है। यही वह कहानी है जिसे दुनिया अब समझने की कोशिश कर रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

The Lancet में 8 अप्रैल 2026 को जारी एक नई पहल, Lancet Commission on Sea-Level Rise, Health and Justice, इस बदलती हकीकत को एक नए नजरिए से देखती है। यह सिर्फ समुद्र के बढ़ने की कहानी नहीं है। यह सीधे इंसानी सेहत, जीवन और बराबरी की कहानी है। यह कमीशन 26 वैश्विक विशेषज्ञों को साथ लाता है, जिनका मकसद है यह समझना कि बढ़ता समुद्री स्तर लोगों की सेहत को कैसे प्रभावित कर रहा है, और इसका जवाब कैसा होना चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

अब तक हम समुद्र के बढ़ने को अक्सर पर्यावरण की समस्या मानते रहे। लेकिन यह रिपोर्ट एक सीधी बात कहती है। यह एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है, जो अभी हो रही है। समुद्र का पानी सिर्फ जमीन नहीं ले रहा। यह धीरे-धीरे पीने के पानी को खराब कर रहा है, फसलों को प्रभावित कर रहा है, और बीमारियों के पैटर्न बदल रहा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

रिपोर्ट के मुताबिक, सदी के अंत तक 41 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं जो हाई टाइड के स्तर से नीचे होंगे। यानी हर ज्वार के साथ खतरा उनके दरवाजे तक आएगा। कमीशन की सह अध्यक्ष Christiana Figueres इसे बहुत साफ शब्दों में कहती हैं कि समुद्र का बढ़ना अब दूर की बात नहीं है। यह आज लोगों की जिंदगी, सेहत और रोज़गार को प्रभावित कर रहा है, खासकर उन लोगों को जिन्होंने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यानी यह सिर्फ क्लाइमेट की कहानी नहीं है। यह न्याय की कहानी भी है। तटीय इलाकों में रहने वाले लोग, छोटे द्वीप, गरीब समुदाय, ये सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जबकि कार्बन एमिशन का बड़ा हिस्सा कहीं और से आता है। Kathryn Bowen एक और अहम बात जोड़ती हैं कि हर सेंटीमीटर समुद्र का बढ़ना सिर्फ पानी का बढ़ना नहीं है। यह असमानता का माप है, जो सबसे ज्यादा उन लोगों को चोट पहुंचाता है जो सबसे कम जिम्मेदार हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इसका असर सिर्फ शरीर पर नहीं, दिमाग पर भी है। विस्थापन, रोज़गार का नुकसान, अनिश्चितता, यह सब मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दबाव बनाते हैं। WHO Asia-Pacific Centre for Environment and Health के डायरेक्टर डॉ सैंड्रो डेमायो इसे और स्पष्ट करते हैं कि समुद्र का बढ़ना अब एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है। और कुछ न करना भी एक फैसला है, जिसका मतलब है लोगों की जिंदगी को खतरे में डालना। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यह सिर्फ डेटा नहीं है, एक चेतावनी भी है
यह कमीशन इसीलिए सिर्फ समस्या नहीं गिनाता। यह समाधान की दिशा भी सुझाता है। इसका फोकस है कि कैसे देशों को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो विज्ञान पर आधारित हों, लेकिन साथ ही न्यायपूर्ण भी हों। कैसे हम ऐसे सिस्टम बना सकते हैं जो सिर्फ मजबूत नहीं, बल्कि बराबरी वाले भी हों। इस पूरी कहानी में एक और बात बार-बार सामने आती है। समुद्र का पानी धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन उसका असर अचानक दिखता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कहीं एक दिन पानी घर के अंदर आ जाता है। कहीं एक मौसम में फसल खत्म हो जाती है। कहीं एक तूफान पूरी बस्ती को हिला देता है। शायद यही सबसे बड़ा खतरा है। हम इसे धीरे-धीरे होता हुआ मानकर टालते रहते हैं। सच यह है कि पानी बढ़ रहा है और उसके साथ जोखिम भी। अब सवाल यह नहीं है कि समुद्र कितना बढ़ेगा। सवाल यह है कि हम कब तक इसे सिर्फ किनारे की कहानी मानते रहेंगे, जबकि यह अब हमारे शरीर, हमारे खाने और हमारी जिंदगी के बीच आ चुका है।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।

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