बदल रहा जंगल का पेटर्न, जानवरों के घर पर हो रहा मौसम के वार
जंगल हमेशा से बदलते रहे हैं। साथ ही मौसम भी बदलता रहता है। अब जो बदल रहा है। वह रफ्तार है और पैटर्न है। अब खतरा धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी का नहीं, बल्कि एक के बाद एक आने वाले झटकों का है। खतरा तो जानवरों के आवास पर ज्यादा मंडरा रहा है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने चिंता जाहिर की है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जर्नल Nature Ecology & Evolution में प्रकाशित एक नई स्टडी इसी बदलती तस्वीर को सामने लाती है। जर्मनी के Potsdam Institute for Climate Impact Research (PIK) के नेतृत्व में 18 वैज्ञानिकों की टीम ने पाया है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी राह पर चलती रही, तो 2085 तक दुनिया के 36 प्रतिशत स्थलीय जानवरों के आवास एक साथ कई तरह की चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में होंगे। हीटवेव, जंगल की आग, सूखा, बाढ़, यह सब अब अलग-अलग घटनाएं नहीं रह जाएंगी, बल्कि एक सिलसिला बन जाएंगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसका मतलब समझना जरूरी है। मान लीजिए किसी इलाके में पहले सूखा पड़ा। जमीन पहले ही कमजोर हो चुकी है। उसके बाद अगर आग लगती है, तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। अगर इसके बाद अचानक बारिश या बाढ़ आ जाए, तो वह पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बिखर सकता है। यानी ये एक झटका नहीं, बल्कि झटकों की श्रृंखला हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्टडी की लीड लेखिका स्टेफनी हाइनिके कहती हैं कि जलवायु परिवर्तन को हम अभी भी कम करके आंक रहे हैं, खासकर चरम घटनाओं के संदर्भ में। यह सिर्फ तापमान के धीरे-धीरे बढ़ने की कहानी नहीं है। एक ही घटना पूरी आबादी को खत्म कर सकती है, और जब कई घटनाएं लगातार होती हैं, तो उनका असर और भी गहरा हो जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसका उदाहरण पहले भी देखा जा चुका है। 2019-20 में ऑस्ट्रेलिया में लगी भीषण जंगल की आग के बाद जिन इलाकों में पहले से सूखा था, वहां पौधों और जानवरों की संख्या में 27 से 40 प्रतिशत ज्यादा गिरावट दर्ज हुई। यानी प्रकृति के पास उबरने का समय ही नहीं था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्टडी बताती है कि अगर उत्सर्जन पर काबू नहीं पाया गया, तो 2050 तक दुनिया के 74 प्रतिशत जानवरों के आवास हीटवेव का सामना करेंगे। 16 प्रतिशत इलाके जंगल की आग के खतरे में होंगे, 8 प्रतिशत सूखे से और 3 प्रतिशत बाढ़ से। अमेजन बेसिन, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे जैव विविधता वाले क्षेत्र इस जोखिम के केंद्र में हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
स्टडी की सह लेखिका कात्या फ्रिलर कहती हैं कि जंगल की आग का जोखिम जितना बड़ा सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। अब तक इसे उतनी गंभीरता से नहीं देखा गया था। यह एक बड़ा ब्लाइंड स्पॉट रहा है। फिर भी तस्वीर पूरी तरह अंधेरी नहीं है। इस स्टडी में एक साफ रास्ता भी दिखता है। अगर दुनिया तेजी से एमिशन घटाती है और तापमान बढ़ने की रफ्तार को सदी के दूसरे हिस्से में रोक लेती है, तो 2085 तक ऐसे आवासों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 9 प्रतिशत रह सकती है। हाइनिके कहती हैं किअभी भी हमारे पास फर्क लाने का मौका है। अगर हम आज से तेजी से एमिशन कम करें, तो इन खतरों को काफी हद तक टाला जा सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यह स्टडी एक और जरूरी सवाल खड़ा करती है। अब तक संरक्षण की ज्यादातर रणनीतियां इस सोच पर बनी थीं कि जलवायु धीरे-धीरे बदलेगा और प्रजातियां अपने आप उसके साथ ढल जाएंगी। लेकिन जब बदलाव झटकों में हो, और लगातार हो, तो अनुकूलन का समय ही खत्म हो जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कहानी यहीं बदलती है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तापमान कितना बढ़ेगा। सवाल यह है कि यह बढ़त किस तरह के झटकों में बदलेगी, और हम उन्हें रोकने के लिए कितनी जल्दी कदम उठाते हैं। क्योंकि अंत में, यह सिर्फ जानवरों के घर की कहानी नहीं है। यह उस संतुलन की कहानी है, जिस पर हमारी अपनी दुनिया भी टिकी हुई है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


