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July 18, 2026

मॉं को समर्पित शिक्षिका डॉ. पुष्पा खण्डूरी की कविता-माँ तुम्हारें बिना सारी खुशिया बेमानी सी लगती हैं

माँ तुम्हारें बिना सारी खुशिया बेमानी सी लगती हैं
कितना मुश्किल है माँ
माँ तुम्हारे से बिना कुछ कहे सुने ऐसे ही जीना
कितना कुछ था कहना,
कितना कुछ था सुनना,
कितना कुछ था पूछना,
कितना कुछ था बताना,
कितना था तुम्हारे संग हंसना समय खुशीख़ुशी बतियाते हुए गुजारना।
कितनी यादें हैं रात्रि में तुम्हारें आँचल में सोना।
तुम्हारा वो मेरा सिर धीरे अंगुलियों से सहलाना,
अपना कम्बल भी रात में खींचकर मुझे ही उड़ाना
मेरी हर उदासी को दूर से
महसूस कर तुम्हारा फोन करना,
बिन बोले ही हर बात समझ जाना और मेरे लिए सुबह सुबह उठ
गरमा गरम चाय लाना
फिर एक दिन यूँअचानक तुम्हारा, चिर मौन सा धारण कर एक दम
यूँ ही चुप होजाना,
सचमुच बहुत अखरता
रहता है हर – पल मेरे
मन को सालता रहता है
जीवन के राह में तुम्हारी,
ममता का साया छिन जाना सा ही लगता है।
सच माँ बहुत मुश्किल है जीना।
माँ तुम्हारें बिना बोले॥
माँ तुम से बिना बोले
हम सबका यूँ मजबूर
हो के बेवश सा जीना
अपनी सारी खुशियाँ बेमानी सी लगती हैं तेरे से बाँटे बिना मनाना॥
त्यौहार भी फीके ही से
आते है जब से तुमने
छोड़ दिया यूँ मुसकाना
माँ सचमुच ही बहुत
कठिन है यूँ घुट घुट
के तेरे से बोले बिना
हमारा सबका जीना
कवयित्री का परिचय
डॉ. पुष्पा खण्डूरी
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हिन्दी
डी.ए.वी ( पीजी ) कालेज
देहरादून, उत्तराखंड।