श्रीदेव सुमन! शत् शत् नमन! तुम हिमालय के लाल जो बने टिहरी रियासत के काल सुमन जी ! तुम तो...
कविता
अज्ञानान्धकार तिमिर ये कैसा प्रसर रहा है मूढ़ मानव बन रहा है। अवनि भी अब रुठ रही है तरुणी निर्लज्ज...
वक्त तो गुजर जाता है वक्त तो गुजर जाता है, यूं कभी कहानी बनकर। अच्छी बुरी यादें रह जाती हैं,...
हम भी तो पत्थर जैसे पत्थर तेरी क्या गजब कहानी, कहीं तू इमारत की नींव बन बैठा। सहता गया छैनी...
एक अजब-सी उलझन में उलझी पड़ी हैं ज़िन्दगी न जाने की किस मंज़िल की तरफ भागे जा रहें न जाने...
क्या मेरे मन के आखर यूं ही क्या मेरे मन के आखर यूं ही, खुद में सिमटकर रह जाएंगे। लिखता...
मेरे शब्द मैं अपने शब्दों को लिख चुका हूं, क्या कोई, मेरे शब्द सुन सकेगा। फंसा हूं क्यों शब्दों के...
हिम कवि आ रहा घर छोड़े वर्षों बीत गए, मैं हिमगिरि पर ही घूम रहा। याद दिलाती मुझे बहुत उनकी,...
जिंदगी वतन के नाम क्या है इंसान बता तेरी ये जिंदगानी, जो काम ना आए वतन के। मौके तो बहुत...
मैं टालता गया मैं टालता गया... जो अवसर आया... जो अवसर आया मैं टालता गया जो अवसर आया मैं टालता...
