"हौसला" तन पर कफ़न बांधे, क्यों वो घर से चल पड़ा है। ना रहे घर में कोई भूखा, सड़क पर...
साहित्य
मुन्ना रावत गजब कु साहस भोर्यूं , तेरा ज्यू- ज्यान भुला. अपड़ा घर बार दगड़, रख अपणु ध्यान भुला.. बालमसिंह...
"मेरे पौधे" न जानें मेरे पौधे ही, क्यों मुझको अच्छे लगते हैं। हवा के झोंके से जब वे हिलते, मन...
अस्तित्व पहाड़ का पानी यहां की जवानी अपने अस्तित्व को लेकर अभी भी तरस रही है क्योंकि- पहाड़ ने कभी...
कब तक खुद को समझाएंगे। ऐसे तो हम मर जाएंगे।। झूठे ख्वाबों से यारो हम। यूं कब तक मन बहलाएंगे।।...
लग रहा बसंत सा लग रहा मृदुल बसंत सा, परिंदों का गुंजन मेरे वन में। दिशाएं सभी महक रही, कलियां...
दु-मुख्या वेन त बड़ै हमु- सबु, बरोबर इक-नसि यख. हमन बड़ै दे वेकि या, धरोहर कन-नसि यख.. क्वी बढ अगनै-क्वी...
पनघट (धारे) मुझको तो मेरे गांव के ही, पनघट (धारे) प्यारे लगते हैं। गर्मी वर्षा आंधी हो या तूफान, अविरल...
पुष्प कहे माली से पुष्प कहे माली सेआज, तेरा मेरा अंत नहीं। टूट भी जाऊं डाली से तो, मेरे जीवन...
सारू जन- लगल्यूं थैं रैंद सारू, झाऽड़ कू. उनि- पुगड़्यूं थैं रैंद सारू, बाऽड़ कू.. एक- हैंका सारू, हर -...
