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August 29, 2026

बचपन पर गर्मी की मार, हर साल 56 करोड़ बच्चे झेल रहे खतरनाक ह्यूमिड हीट का एक अतिरिक्त महीना

चाहे बहुत तेज गर्मी पड़ रही हो या फिर बहुत ज्यादा सर्दी। तब चिकित्सक और विशेषज्ञ ये ही कहते हैं कि बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखें। अब बात गर्मी की करते हैं। गर्मी सबके लिए एक जैसी नहीं होती। किसी के लिए यह असहज मौसम है, तो किसी के लिए यह शरीर पर गंभीर दबाव डाल सकती है। यदि बच्चों की बात करें तो गर्मी से उनके लिए खतरा और बड़ा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नई रिसर्च में दावा
Vrije Universiteit Brussel (VUB) के नेतृत्व में हुई नई रिसर्च के मुताबिक, दुनिया में 0 से 9 साल की उम्र के करीब 43 प्रतिशत बच्चे यानी 56 करोड़ तक बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने ऐसी नम गर्मी यानी ह्यूमिड हीट का सामना कर रहे हैं, जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा हुई है। यह असर किसी भी दूसरे आयु वर्ग की तुलना में बच्चों पर ज्यादा है। यदि बुजुर्गों की बात करें तो इसी तुलना में 60 से 69 साल की उम्र के करीब 19 करोड़ लोग, यानी 30 प्रतिशत लोग, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने ऐसी गर्मी का सामना कर रहे हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

स्टडी 26 अगस्त को Science Advances में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने पहली बार वैश्विक स्तर पर यह मापने की कोशिश की है कि जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ी अतिरिक्त गर्मी अलग-अलग आयु वर्गों को किस तरह प्रभावित कर रही है। इसके लिए आबादी के आंकड़ों को आधुनिक जलवायु मॉडल और जलवायु परिवर्तन के कारण किसी चरम मौसम की घटना कितनी बदली है, यह पता लगाने वाली वैज्ञानिक विधियों के साथ जोड़ा गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

थर्मामीटर पर दर्ज तापमान में नहीं है ऐसी गर्मी
यहां एक बात समझना जरूरी है। रिसर्च में जिस हीट स्ट्रेस की बात की गई है, वह सिर्फ़ थर्मामीटर पर दर्ज तापमान नहीं है। स्टडी ने ह्यूमिड हीट पर ध्यान दिया है। यानी ऐसी गर्मी जिसमें हवा में नमी ज्यादा होने के कारण शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इसी वजह से समान तापमान पर सूखी गर्मी की तुलना में नम गर्मी ज्यादा खतरनाक हो सकती है। शोधकर्ताओं ने छाया में 28°C से ऊपर वेट-बल्ब ग्लोब तापमान को हीट स्ट्रेस की स्थिति के तौर पर इस्तेमाल किया है। ऐसे हालात में बीमारी से बचने के लिए शारीरिक गतिविधि कम करने और आराम की अवधि तय करने जैसी सावधानियां जरूरी हो सकती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

बढ़ गई है इस गर्मी को झेलने वाले बच्चों की संख्या
समस्या सिर्फ़ यह नहीं है कि बच्चे गर्मी झेल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने उन दिनों की संख्या भी काफी बढ़ा दी है जिनमें बच्चे इस तरह की गर्मी का सामना करते हैं। आज की दुनिया में करीब 35 करोड़ बच्चे, यानी 0 से 9 साल की उम्र के लगभग 27 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम पांच महीने की कुल हीट स्ट्रेस स्थितियों के संपर्क में आते हैं। जलवायु परिवर्तन के बिना ऐसी स्थितियों में रहने वाले बच्चों की संख्या करीब 12 करोड़, यानी 9 प्रतिशत होती। यानी मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने पांच महीने या उससे ज्यादा कुल हीट स्ट्रेस झेलने वाले बच्चों की संख्या को लगभग तीन गुना कर दिया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इन क्षेत्र में है ज्यादा समस्या
इसका असर दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है। दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका वे क्षेत्र हैं जहां आज सबसे ज्यादा बच्चे खतरनाक ह्यूमिड हीट के संपर्क में हैं। इन क्षेत्रों में गर्म और नम परिस्थितियों के साथ-साथ बच्चों की आबादी का हिस्सा भी बड़ा है। यही वजह है कि जलवायु संकट और सामाजिक असमानता यहां एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

विशेषज्ञों का तर्क
VUB की स्टडी की प्रमुख लेखिका रोजा पिएत्रोइउस्ती के मुताबिक, विकासशील देशों के बच्चे जलवायु चरम घटनाओं के संपर्क में ज्यादा हैं, जबकि ऐतिहासिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उनका योगदान सबसे कम रहा है। गरीबी, कमजोर आवास, ठंडक पाने के सीमित साधन और दबाव में काम कर रही स्वास्थ्य व्यवस्थाएं गर्मी से बचने के विकल्पों को और सीमित कर देती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

वयस्कों की देखभाल पर निर्भर
बच्चों का शरीर भी उन्हें गर्मी के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाता है। उनका शरीर वयस्कों की तुलना में तेजी से गर्म होता है और वे पसीने के जरिए शरीर को ठंडा करने में उतने प्रभावी नहीं होते। छोटे बच्चों को गर्मी से बचने के लिए वयस्कों की देखभाल पर भी निर्भर रहना पड़ता है। ज्यादा गर्मी से डिहाइड्रेशन और हीटस्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। गंभीर स्थिति में शरीर के सामान्य कामकाज पर असर पड़ सकता है और अंगों को नुकसान तक पहुंच सकता है। लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी का असर बच्चों की सीखने और संज्ञानात्मक विकास पर भी पड़ सकता है। आगे की तस्वीर और गंभीर हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

वैश्विक तापमान वृद्धि का अनुमान खौफनाक
अगर वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5°C तक पहुंचती है, तो अनुमान है कि 0 से 9 साल के करीब 62 करोड़ बच्चे, यानी 49 प्रतिशत बच्चे, हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने के जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हीट स्ट्रेस स्थितियों के संपर्क में होंगे। इनमें करीब 39 करोड़ बच्चे हर साल कुल पांच महीने या उससे ज्यादा हीट स्ट्रेस झेल सकते हैं। 2°C की ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में यह संख्या बढ़कर करीब 65 करोड़ बच्चे, यानी इस आयु वर्ग के 59 प्रतिशत बच्चों तक पहुंच सकती है। करीब 42 करोड़ बच्चे साल में पांच महीने या उससे ज्यादा कुल हीट स्ट्रेस का सामना कर सकते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

गर्मी के बीच का अंतर
यहां “अतिरिक्त” और “कुल” गर्मी के बीच अंतर भी अहम है। अतिरिक्त हीट स्ट्रेस वे दिन हैं जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हुए हैं और जलवायु परिवर्तन के बिना नहीं होते। कुल हीट स्ट्रेस में वे सभी दिन शामिल हैं, जो जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से भी होते। VUB के वरिष्ठ लेखक और प्रोफेसर विम थियरी के मुताबिक बच्चों और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए फॉसिल फ्यूल से होने वाले उत्सर्जन में तेजी से कटौती करनी होगी और ग्लोबल वार्मिंग को पेरिस समझौते के अनुरूप सीमित करना होगा। साथ ही विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त बढ़ाने और हीट एक्शन प्लान तथा बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी अनुकूलन पहलों को मजबूत करने की जरूरत होगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

भारत के लिए खास मायने रखता है ये आंकड़ा
भारत के लिए यह आंकड़ा खास तौर पर मायने रखता है। स्टडी के अनुसार दक्षिण एशिया दुनिया के उन क्षेत्रों में है जहां आज सबसे ज्यादा बच्चे खतरनाक गर्मी के संपर्क में हैं। हालांकि इस प्रेस रिलीज में भारत के लिए अलग से बच्चों की संख्या नहीं दी गई है। इसलिए भारत में प्रभावित बच्चों की कोई सटीक संख्या इस अध्ययन के आधार पर बताना उचित नहीं होगा। साथ ही संदेश साफ है। जलवायु परिवर्तन का असर बच्चों के भविष्य पर सिर्फ़ किसी दूर की तारीख में नहीं पड़ेगा। वह उनके शरीर पर आज दर्ज हो रहा है, उन दिनों की संख्या में दर्ज हो रहा है जब बाहर खेलना मुश्किल हो जाता है, स्कूल जाना जोखिम भरा हो सकता है और शरीर को सामान्य तापमान पर रखना खुद एक चुनौती बन जाता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

सुरक्षित बचपन की चिंता
गर्मी बढ़ने की कहानी अक्सर तापमान के आंकड़ों से शुरू होती है। यह स्टडी उसे बच्चों की उम्र में बदल देती है। सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं है कि दुनिया कितनी गर्म हो रही है। सवाल यह भी है कि इस बढ़ती गर्मी में बच्चे कितने दिन सुरक्षित बचपन जी पाएंगे।
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Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।