Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

September 14, 2026

ब्रिक्स में जलवायु अब पर्यावरण का नहीं, अर्थव्यवस्था का है सवाल

जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बातचीत में एक सवाल अक्सर सबसे आगे रहता है। एमिशन कितना कम होगा, लेकिन नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां सवाल सिर्फ एमिशन घटाने का नहीं है। सवाल यह भी है कि अगर जलवायु आपदाएं बढ़ती हैं तो सड़कों, शहरों, बिजली व्यवस्था, खाद्य आपूर्ति और कारोबार को कैसे बचाया जाए। विकासशील देशों के पास इसके लिए पैसा कहां से आए। बदलती ऊर्जा व्यवस्था में जरूरी खनिजों की आपूर्ति कौन नियंत्रित करे। और सबसे अहम, इन नियमों को बनाएगा कौन? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

घोषणा कहती है जलवायु की कहानी
ब्रिक्स की 45 पन्नों की नई दिल्ली घोषणा को पढ़ने पर जलवायु की कहानी इसी बड़े सवाल के भीतर दिखाई देती है। भारत की अध्यक्षता में तैयार हुई घोषणा में जलवायु, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, बुनियादी ढांचे, वित्त, खाद्य सुरक्षा और आपदा-जोखिम को अलग-अलग खानों में रखने के बजाय एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की गई है। यही इस घोषणा की सबसे महत्वपूर्ण बात हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

जलवायु मंत्रालय की सीमा से बाहर
विस्तारित ब्रिक्स में 11 सदस्य देश हैं और उसके साथ साझेदार देशों का एक अलग ढांचा भी विकसित किया जा रहा है। ये देश दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे समूह के लिए जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का विषय नहीं हो सकता। अगर बाढ़ किसी बंदरगाह को रोक देती है, सूखा कृषि उत्पादन घटा देता है, गर्मी बिजली की मांग बढ़ा देती है या किसी आपदा में सड़क और पुल टूट जाते हैं, तो उसका असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नई दिल्ली घोषणा में इसी कड़ी को मजबूत किया गया है। जलवायु जोखिम को औद्योगिक नीति, महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा प्रणालियों, आपूर्ति शृंखलाओं, बुनियादी ढांचे, छोटे कारोबार, बीमा और खाद्य सुरक्षा से जोड़ा गया है। यानी जलवायु नीति अब यह पूछने लगी है कि अर्थव्यवस्था को जलवायु जोखिम से कैसे बचाया जाए। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विकासशील देशों के सामने एक साथ दो दबाव हैं। उन्हें आर्थिक विकास भी करना है और बढ़ते जलवायु जोखिम से भी निपटना है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नेपाल की तबाही के बाद और बड़ा हो गया यह सवाल
ब्रिक्स घोषणा ऐसे समय आई है जब कुछ ही दिन पहले नेपाल ने एक बेहद अचानक और विनाशकारी पर्वतीय आपदा का सामना किया। 26 अगस्त को रसुवा में ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने से पैदा हुई बर्फ-चट्टान की avalanche कुछ ही मिनटों में मलबे और बाढ़ में बदल गई। ऐसी घटनाएं एक असुविधाजनक सच्चाई सामने लाती हैं। हर आपदा को पहले से चेतावनी देकर नहीं रोका जा सकता। लेकिन शुरुआती चेतावनी और निकासी-व्यवस्था कई मामलों में जनहानि कम कर सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

कई जगहों पर शुरुआती चेतावनी प्रणाली लोगों की जान बचा सकती है। लेकिन अगर पहाड़ का कोई हिस्सा अचानक टूटता है और कुछ मिनटों में नदी घाटी तक पहुंच जाता है, तो चेतावनी के लिए समय ही नहीं मिलता। इसीलिए ब्रिक्स घोषणा में आपदा जोखिम को लेकर शुरुआती चेतावनी प्रणाली के साथ-साथ जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे, जोखिम आधारित योजना और पहले से तैयारी पर जोर दिया गया है। घोषणा में जलवायु-लचीले शहरी बुनियादी ढांचे के लिए स्वैच्छिक सिद्धांतों और शुरुआती चेतावनी के आंकड़ों को योजना में शामिल करने का समर्थन किया गया है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। सवाल अब केवल यह नहीं है कि आपदा आने से पहले हमें कैसे पता चले। सवाल यह भी है कि अगर पता न चल सके तो क्या हमारी सड़क, पुल, बिजली व्यवस्था और शहर उस झटके को सह पाएंगे? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

जलवायु वित्त का सवाल, असल में विकास का सवाल
जलवायु कार्रवाई की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक पैसा है। विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। उसी समय उन्हें बाढ़ से बचने वाली सड़कें, गर्मी सहने वाले शहर, बेहतर जल प्रबंधन, सुरक्षित बिजली व्यवस्था और जलवायु-अनुकूल कृषि में निवेश करना है। नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स ने कर्ज की स्थिरता और विकासशील देशों के लिए वित्तीय गुंजाइश बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है। घोषणा में अनुकूलन के लिए पर्याप्त, अतिरिक्त, पूर्वानुमेय और आसानी से उपलब्ध वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण के समर्थन की मांग भी दोहराई गई है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। विकासशील देशों का तर्क है कि अगर जलवायु परिवर्तन उनके विकास के रास्ते को प्रभावित कर रहा है, तो जलवायु वित्त को विकास वित्त से अलग करके नहीं देखा जा सकता। नई विकास बैंक की भूमिका, स्थानीय मुद्रा में ऋण और बुनियादी ढांचा निवेश के विस्तार की बात भी इसी संदर्भ में आती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

फिर आता है कार्बन बॉर्डर टैक्स
ब्रिक्स की जलवायु नीति का सबसे विवादित हिस्सा शायद यहां है। घोषणा में उन कार्बन सीमा समायोजन उपायों का विरोध किया गया है जिन्हें सदस्य देश एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण या संरक्षणवादी मानते हैं। यह बहस सीधे व्यापार से जुड़ती है। यूरोप जैसे बाजारों में कार्बन की मात्रा के आधार पर आयात पर अतिरिक्त लागत लगाने की व्यवस्था विकसित हो रही है। इसका तर्क है कि प्रदूषण की कीमत तय की जाए और उद्योगों को कम-कार्बन उत्पादन की ओर ले जाया जाए, लेकिन विकासशील देशों की चिंता अलग है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

उनका सवाल है कि अगर विकसित बाजार अपने पर्यावरणीय मानकों को दूसरे देशों के उत्पादों पर लागू करते हैं, तो क्या इससे उन देशों के विकास और निर्यात की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा? ब्रिक्स का जवाब है कि जलवायु से जुड़ी व्यापार व्यवस्था बहुपक्षीय और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण होनी चाहिए। यानी जलवायु कार्रवाई के नियमों पर भी वही पुराना सवाल लौटता है। नियम कौन बनाएगा और किसकी आवाज सुनी जाएगी? (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

हरित अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी खनिजों पर भी नजर
एनर्जी ट्रांज़िशन की एक विडंबना है। फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करने के लिए दुनिया को सौर ऊर्जा, बैटरी, विद्युत वाहन, बिजली ग्रिड और हाइड्रोजन जैसी तकनीकों की जरूरत है। लेकिन इनके लिए महत्वपूर्ण खनिज चाहिए। इन खनिजों की आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित है। ब्रिक्स घोषणा में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक विश्वसनीय, विविध, टिकाऊ और न्यायपूर्ण बनाने पर जोर दिया गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

साथ ही संसाधन संपन्न विकासशील देशों को केवल कच्चा माल निर्यात करने के बजाय उसी देश में अधिक मूल्यवर्धन और विनिर्माण का हिस्सा हासिल करने की बात भी की गई है। यानी एनर्जी ट्रांज़िशन को सिर्फ जलवायु लक्ष्य के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे औद्योगिक नीति और आर्थिक शक्ति के सवाल के रूप में भी देखा जा रहा है। सौर ऊर्जा, हाइड्रोजन, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग की बातें इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

नेट जीरो शब्द से ज्यादा महत्वपूर्ण है विकास का तरीका
कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रथिन रॉय ने घोषणा में एक दिलचस्प बात देखी है। उनके मुताबिक, दस्तावेज में टिकाऊ विकास की चर्चा जलवायु परिवर्तन से व्यापक दायरे में की गई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि घोषणा में पश्चिमी जलवायु विमर्श में बेहद प्रचलित शब्द ‘नेट जीरो’ प्रमुख फ्रेम के रूप में दिखाई नहीं देता। इसके बजाय टिकाऊ विकास को गरीबी, असमानता, पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े व्यापक राजनीतिक-अर्थशास्त्रीय सवाल के रूप में देखा गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यह अंतर छोटा नहीं है। क्योंकि विकासशील देशों के लिए जलवायु कार्रवाई का सवाल अक्सर यह नहीं होता कि एमिशन शून्य कब होगा। उनके लिए सवाल होता है कि ऊर्जा सस्ती रहेगी या नहीं। बिजली सबको मिलेगी या नहीं। उद्योगों को रोजगार मिलेगा या नहीं। किसान जलवायु झटकों से बच पाएंगे या नहीं। और विकास के लिए जरूरी वित्त कहां से आएगा। यही वजह है कि ब्रिक्स घोषणा में न्यायसंगत संक्रमण, राष्ट्रीय परिस्थितियों और साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत पर जोर दिया गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

क्या यह जलवायु कार्रवाई से पीछे हटना है
जरूरी नहीं, लेकिन यह जलवायु कार्रवाई की एक अलग राजनीतिक भाषा जरूर है। चीन क्लाइमेट हब, एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक ली शुओ के मुताबिक, ब्रिक्स विकास और डीकार्बोनाइजेशन को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य के रूप में देखने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा है। इसमें फॉसिल फ्यूल की भूमिका को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास से जोड़ा गया है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

यहीं ब्रिक्स और पश्चिमी जलवायु विमर्श के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। ब्रिक्स का तर्क है कि एनर्जी ट्रांज़िशन ऐसा होना चाहिए जिसमें विकासशील देशों की ऊर्जा जरूरतें, उनकी आर्थिक क्षमता और उनकी राष्ट्रीय परिस्थितियां शामिल हों। इसका मतलब यह नहीं कि ट्रांज़िशन की जरूरत खत्म हो गई। मतलब यह है कि ट्रांज़िशन की शर्तें कौन तय करेगा, यह भी जलवायु राजनीति का हिस्सा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

असली परीक्षा घोषणा के बाद होगी शुरू
नई दिल्ली घोषणा में कई महत्वपूर्ण सहयोगी पहलों का उल्लेख है। कार्बन बाजारों पर सहयोग, जलवायु अनुसंधान, समुदाय आधारित अनुकूलन, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, हाइड्रोजन, महत्वपूर्ण खनिज, परिवहन का डीकार्बोनाइजेशन, आपदा जोखिम और जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्र इसमें शामिल हैं, लेकिन घोषणाओं और जमीन पर बदलाव के बीच हमेशा एक दूरी रहती है। ब्रिक्स के सामने असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये साझा प्राथमिकताएं वास्तविक परियोजनाओं, वित्त, तकनीकी सहयोग और बेहतर आपदा तैयारी में बदलती हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

विशेषज्ञों की राय
विश्व संसाधन संस्थान इंडिया की कार्यकारी निदेशक उल्का केलकर के मुताबिक, जलवायु-लचीले शहरी बुनियादी ढांचे और आपदा जोखिम साझा करने की नई व्यवस्थाएं इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं। खासकर तब, जब जलवायु परिवर्तन पारंपरिक बीमा और जोखिम प्रबंधन व्यवस्थाओं की सीमाएं सामने ला रहा है। ऊर्जा और जलवायु नीति विशेषज्ञ अंब मंजीव पुरी इसे वैश्विक दक्षिण की लंबे समय से चली आ रही मांगों की पुनर्पुष्टि मानते हैं। उनके मुताबिक, बदलती दुनिया में सहयोग, आपूर्ति शृंखलाओं और आपदा तैयारी के जरिए लचीलापन बढ़ाना अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। शायद यही इस 45 पन्नों की घोषणा को पढ़ने का सबसे उपयोगी तरीका भी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ब्रिक्स जलवायु संकट का समाधान अपने आप नहीं दे रहा। लेकिन वह यह जरूर कह रहा है कि जलवायु संकट को अब अर्थव्यवस्था से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता। किस देश के पास कितना पैसा है। कौन सी तकनीक किसके पास है। महत्वपूर्ण खनिज कहां हैं। ऊर्जा की कीमत कौन तय करता है। व्यापार के नियम कौन बनाता है। आपदा का जोखिम कौन उठाता है। और विकास की कीमत कौन चुकाता है। जलवायु राजनीति अब इन सभी सवालों के बीच बैठी है। नई दिल्ली की घोषणा की असली कहानी शायद यही है।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal

लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।