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July 12, 2026

ग्राफिक एरा में संगोष्ठी, लोक गायकों ने कहा-लोक संगीत के मूल रूप से छेड़छाड़ होगा लोक संस्कृति से खिलवाड़

देहरादून में ग्राफिक एरा पर्वतीय विश्वविद्यालय में उत्तराखंड के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक गायकों का मानना था कि उत्तराखंड के लोक संगीत में बदलाव की गुंजाइश तो है पर उन्हें संरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि पहाड़ी लोक संगीत के मूल रूप को बरकरार रखा जाए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
विश्वविद्यालय के मीडिया एंड मास कम्युनिकेशन विभाग की संगोष्ठी में आज अपने विचार व्यक्त करते हुए इन दिग्गजों ने कहा कि नई पीढ़ी को अपील करने के लिए उत्तराखंड के लोक संगीत को समकालीन टेक्नोलॉजी और म्यूजिक के उपयोग से नया रूप दिया जा सकता है। साथ ही ध्यान रखना जरूरी है कि उनके मूल रूप से खिलवाड़ राज्य की लोक संस्कृति से खिलवाड़ होगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

जात्रा- ए कॉल फॉर जर्नी बैक होम, विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने कहा की जनरेशन गैप की वजह से हो सकता है की पारंपरिक संगीत सभी युवाओं को अपील नहीं करें। इसलिए लोक संगीत में कुछ परिमार्जिता की जा सकती है। पर राज्य की संस्कृति और लोक कला को संरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि लोक संगीत को उसके मूल रूप में संरक्षित रखा जाए। युवा लोक गायकों के लिए जरूरी है कि वह किसी और कलाकार की कॉपी करके न गाए। बल्कि खुद कलाकार बन कर गाए। ऐसा करने पर वह पारंपरिक लोकगीतों को नई पीढ़ी के लिए नए अंदाज में पेश कर सकते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

प्रसिद्ध लोक संस्कृति कर्मी पद्मश्री डॉ माधुरी बर्तवाल ने कहा कि संस्कृति हमारी पहचान ही नहीं बल्कि हमारी जड़ भी होती है। और बिना जड़ से जुड़े संस्कृति के पेड़ के पत्ते हरे भरे नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के लोकगीत, संगीत, भाषा और भाव की दृष्टि से अति समृद्ध है। इनको संरक्षित करना उत्तराखंड की संस्कृति को संरक्षित करना जैसा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

लोकप्रिय मांगल गायिका पद्मश्री बसंती बिष्ट ने कहा कि उनकी पीढ़ी द्वारा गाए गए लोकगीत, गेहूं जैसे हैं। जिनका मूल गुण बरकरार रखते हुए युवा पीढ़ी चाहे तो उस गेहूं से मैदा, आटा, या दलिया बनाकर परोस सकती है। हमारे लोक गीतों में इतनी ताकत है कि वह कानों को लुभाने के साथ-साथ मन को नियंत्रित और एकाग्र कर जीवन में भटकने नहीं देते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

जानी-मानी भाषाविद, लेखिका और कवियत्री बीना बेंजवाल ने कहा कि भाषा हमें अपने पूर्वजों से मिलती है। बिना सहेजे यह भी पैतृक संपत्ति की तरह धीरे-धीरे विलुप्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में बोली जाने वाली गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी की शब्द संपदा हिंदी से भी ज्यादा समृद्ध है। संरक्षण के अभाव में यह संपदा विलुप्त हो सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

 

हिमाचल के राग स्टूडियो के गोपाल शर्मा, राजेंद्र आचार्य, युवा गायिका ‘उप्रेती सिस्टर’ की ज्योति उप्रेती सती और नीरजा उप्रेती, भित्ति कला के युवा कलाकार हेमंत पैन्यूली, पंडवाज के नाम से प्रसिद्ध सलिल, कुणाल, और ईशान डोभाल ने भी संगोष्ठी में उत्तराखंड की लोक संस्कृति पर प्रकाश डाला। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इससे पहले ‘सस्टेनेबल एनवायरमेंट एंड कल्चरल सपोर्ट’ विषय पर पैनल डिस्कशन आयोजित किया गया। जिसमें उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (यूसर्क) के वैज्ञानिक डॉ गजेंद्र सिंह, युवा उद्यमी कंचन जलदी, विश्वविद्यालय के एलुमनाई और देवस्थली ग्रुप के संस्थापक शिवांक थपलियाल, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ अरविंद धर, एनवायरनमेंट साइंस के विभागाध्यक्ष डॉ केके जोशी ने उत्तराखंड में प्रलायन, संस्कृति और पर्यावरण के परिदृश्य पर अपने विचार रखे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

इस संगोष्ठी का आयोजन छात्र छात्राओं के सांस्कृतिक ग्रुप देवस्थली के सहयोग से हुआ। इस अवसर पर छात्रों के नंदा ग्रुप ने लोक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। पैनल डिस्क्यूशन्स का मॉडरेशन रंगकर्मी डॉ राकेश भट्ट और प्रसिद्ध समाजसेवी अनूप नौटियाल ने किया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)

ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी के महानिदेशक, प्रोफेसर (डॉ ) संजय जसोला, ग्राफिक एरा पर्वतीय विश्वविद्यालय के डायरेक्टर जनरल, प्रोफेसर (डॉ) एच एन नागराजा, कुलपति प्रोफ डॉ आर गौरी, मीडिया और मास कम्युनिकेशन की विभागाध्यक्ष डॉ ताहा सिद्धकी अन्य शिक्षक और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर हिमानी बिंजोला और डॉक्टर विदुषी नेगी ने किया।