देव पूजा तोड़ रही हैं भूतिया गांव के सन्नाटे, नजर आ रही है गांवों में रौनक
उत्तराखंड के गांवों से लोगों का पलायन। गांवों में सिमटते परिवार। अंगुली में गिने चुने लोग। गांवों में ऐसा सन्नाटा जैसे वहां भूत आ गए हों। भूतिया गांव, भूतिया घर, खाली खेत, कुछ ऐसा नजारा कई गावों में नजर आ सकता है। इस बीच अच्छी खबर ये है कि मानव शून्य होते गाँवों का सन्नाटा सामूहिक देव पूजाएं तोड़ रही हैं। इस बहाने लोग जुट रहे हैं और गांवों में कुछ दिनों के लिए रौनक लौट रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जनपद पौडी गढ़वाल के एकेश्वर ब्लॉक के अधिकांश गाँव पलायन के चलते खाली हो चुके है। गांव मे स्थायी रूप से निवास करने वाले परिवारों की संख्या लगातार घटती जा रही है। परगना चोन्दकोट के अंतर्गत ग्राम डांग मे भी मात्र तीन परिवार निवास कर रहे हैं। इस गांवं की कुल जनसंख्या छह लोगों तक सिमट गई है। जिन खेतो मे कभी धान, गेहूँ की फसल लहलहाती थी, आज वे बंजर पड़े है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
देहरादून में बस चुके डांग गांव निवासी एवं ईश पूजा कार्यक्रम के संयोजक वीके धस्माना ने बताया कि गांवों में देव मंदिरों का जीर्णोधार तो हुआ है, लेकिन उनमे दीया बाती जलाने वाले लोग शहरों मे बस चुके हैं। ऐसे मे माह जून मे होने वाली देव पुजाएं गाँव का सन्नाटा तोड़ रही हैं। अपने इष्ट देवताओ की पूजा के कार्यकर्म मे परवासियों की रुचि बड़ रही है। कई प्रवासी गांव मे अपने खंडहर हो चुके मकानों का जीर्णोधार कर चुके हैं। डांग गांव मे पहली बार आयोजित देव पूजा में पलायन कर चुके लोग काफी उत्साह दिखा रहे हैं। दो दिन चले ईश कार्यक्रम मे भैरव नाथ एवं कालि मां की पूजा के साथ भंडारे का आयोजन भी किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने बताया कि सेना से सेवानिवृत्त धीरज धस्माना की पहल से आयोजित ईश कार्यक्रम के अंत मे उपस्थित ग्रामीणों के मध्य आयोजित विचार गोष्ठी में गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए गहन विचार विमर्श किया गया। इस दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि हर प्रवासी गांव मे अपने खंडहर पड़े मकानों का जीर्णोधार करें। खाली पड़ी बंजर जमीन पर संबंधित विभागों के सहयोग से सामूहिक रूप से फलदार पौंधों का रोपण करें। यह भी प्रस्तावित किया गया कि प्रवासी वर्ष मे कुछ माह गांव मे बिताएं। इससे नई पीढ़ी का रुझान गांव की तरफ बढ़ेगा। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ईश तरह के कार्यक्रम को हर वर्ष किये जाने का भी निर्णय भी लिया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में नवीन धस्माना, केशव धस्माना, विकेश, अरुण, विमल, नीरज धस्माना, सोहन लाल, राम स्वरूप धस्माना, विजय बर्धन पहली बार देहरादून से गांव आए। अंबाला से सपरिवार ललित मोहन धस्माना, दिल्ली से वीरेंद्र प्रसाद, अनिल, सुनील, लक्ष्मी धस्माना आदि पहुंचे। उन्होंने ईश कार्यक्रम के अयोजको की सराहना करते हुए पलायन कर चुके लोगों को गांव में एकत्र करने के लिए धन्यवाद दिया।
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