Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

August 4, 2026

पढ़िए दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल- कै छाल चलि गे

कै छाल चलि गे
मठु-मठु करि जिंदगी , पलि छाल चलि गे.
ज्यूकि भूक दिनौं-दिन, छलि-छाल चलि गे..

न सोचू – न गांणू , न जीवन पच्छ्यांणू.
कब क्य ह्वे- कनु ह्वे , तलि छाल चलि गे..

ब्वे-बुबान बतै-समझै , अपड़ौं से बड़ैं रखि.
अपड़ौं खोजदैं बतौं , कैं ढंडी ताऴ चलि गे..

मिन नि कै – तिन नि कै , चल बतौ कैन कै.
ईं अमोल़ जिंदगी कू , करि कुहाल चलि गे..

क्य ! इनीं ह्वे जमना बटि , इनीं चलदु रै.
क्वी न्यऴणू रै , क्वी मालौं – माल चलि गे..

बगत फरि कुछनि जाॅड़ीं , करदा खैंचाताॅड़ीं.
बिगर बतयां-चितयां , बतौ कै छाल चलि गे..

‘दीन’ अरे जमना कन बदले , मिंट – मिटौंम.
हम त तकदै रवां , तु करि बुराहाल चलि गे..

@ दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’

कवि का परिचय
नाम .. दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’

गाँव.. माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य
सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।