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June 23, 2026

जानिए उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के बारे में, क्यों पड़ा इसका ये नाम

रुद्रप्रयाग जिला सागरतल से 2000 फीट की ऊँचाई तथा हरिद्वार से 166 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। पहले ये तीन जिलों का अंग था। इसका भौगोलिक क्षेत्रफल करीब 1984 वर्ग किलोमीटर है। 2011 की जनगणना के आधार पर यहां की जनसंख्या 242,285 है। उत्तराखंड के इस प्राचीनतम नगर में मन्दाकिनी और अलकनंदा नदी का संगम स्थल है। स्कन्दपुराण के केदारखंड में उल्लेख है कि इस रुद्रप्रयाग में देवर्षि नारद ने संगीत विद्या में पारंगत होने के लिए रुद्र भगवान की तपस्या की थी। भगवान रुद्र ने नारद की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें संगीत शास्त्र का पूर्ण ज्ञान कराया और साथ ही एक वीणा वादन यन्त्र भी प्रदान किया था।

वर्ष 1997 को हुआ था जिले का गठन
रुद्रप्रयाग जिला 16 सितंबर 1997 को स्थापित किया गया था। यह अलकनन्दा और मंदाकिनी दो नदियों के संगम पर स्थित है। रुद्रप्रयाग, पंच प्रयागों में से एक है और अलकनंदा नदी के पांच संगम में से एक हैं। रुद्रप्रयाग को प्राकृतिक सौन्दर्य उपहार स्वरुप प्राप्त हुआ है जो जलवायु क्षेत्र की ऊंचाई पर निर्भर करता है। जिले को तीन निकटवर्ती जिलों के निम्नलिखित क्षेत्रों से बनाया गया था।
अगस्तमुनी और उखीमठ ब्लॉक को पूर्ण रूप से एवं पोखरी एवं कर्णप्रयाग ब्लॉक का कुछ हिस्सा चमोली जिले से लिया गया है। जखोली और किर्तीनगर ब्लॉक का हिस्सा टिहरी जिले से और खिरसू ब्लॉक का हिस्सा पौड़ी जिले से लिया गया है।

भगवान रुद्रेश्वर का प्राचीन मंदिर
रुद्रप्रयाग संगम की ऊपरी दिशा में दोनों नदियों के मध्य क्षेत्र में एक संकरी कोठानुमा चट्टान पर भगवान रुद्रेश्वर का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को रुद्रप्रयाग के नाम से पुकारते हैं। यहाँ से एक मार्ग अलकनंदा के किनारे होते हुए बदरीनाथ को और दूसरा मार्ग मंदाकिनी घाटी होते हुए केदारनाथ की ओर को जाता हतीन जिलों से लगती हैं इसकी सीमाएं
एक अन्य मार्ग अलकनन्दा के दायें किनारे होते हुए चोपता की ओर चला जाता है। जिसका चमोली में बदरीनाथ मार्ग से संगम होता है। यहीं से एक अन्य मार्ग तिलवाड़ा, जाखड़ा और जखोली लस्या होते हुए घनसाली (टिहरी गढ़वाल) को जा मिलता है। रुद्रप्रयाग से हो एक और मार्ग बडियारगढ़ को भी जाता है। रुद्रप्रयाग स्वयं में एक स्वतंत्र जिला घोषित होने के साथ-साथ अन्य जिले पौड़ी, टिहरी और चमोली की सीमाओं से भी लगता हुआ है।
कोटेश्वर महादेव
रुद्रप्रयाग नगर से लगभ पाँच किलोमीटर की दूरी पर बेलाग्राम के निकट कोटेश्वर महादेव का चट्टानी कोटर गुफा मन्दिर है जो अलकनन्दा के दायें किनारे पर स्थित है। इस प्राकृतिक पाषाण गुफा तक जाने के लिए चट्टान काटकर सीढ़ियाँ बनायी गयी है। इन सीढ़ियों के समाप्त होने पर दो मन्दिर है। जिनमें से एक मन्दिर में भगवान शिव की बड़े कुण्डलधारी सौम्य प्रभावशाली मूर्ति है। इस मन्दिर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पूर्व दिशा में कोटेश्वर महादेव का मन्दिर है। इस पाषाण गुफा तक जाने के लिए लगभग दो फुट चौड़ा मार्ग चट्टान को काटकर निर्मित
किया गया है। इस गुफा से पहले बहुत ऊँचाई से एक जलधारा गिरती है। जिसका उद्गम एक कठोर चट्टान के मध्य भाग से होता है। इस पाषाण गुफा की लम्बाई आठ फुट और चौड़ाई पाँच फुट तथा ऊँचाई आठ फुट के लगभग है। गुफा के ठीक बायें कोने में एक शालिग्राम की आकृति में धारीदार शिवलिंग है। इस शिवलिंग के स्पर्श मात्र में ही एक आध्यात्मिक आनन्द की अनुभूति होती है।


तिलवाड़ा
रुद्रप्रयाग से आठ किलोमीटर के अन्तर पर तथा 1194 फीट ऊँचाई पर तिलवाड़ा स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए सुरंग पार कर मन्दाकिनी नदी के किनारे-किनारे यात्रा करनी पड़ती है। यही सड़क आगे चलकर घनसाली होते हुए टिहरी पहुँचती है।
अगस्त्यमुनि
यह तीर्थ रुद्रप्रयाग से 19 किलोमीटर दूरी पर मन्दाकिनी उपत्यका में पड़ता है। यहाँ से गुप्तकाशी 20 किलोमीटर के अन्तर पर है। इस स्थान में मन्दाकिनी ने एक समतल विशाल मैदान बनाया है। अगस्त्यमुनि, बूलगाड़ ओर मंदाकिनी के संगम पर बसा हुआ है। इस भूमि का सम्बन्ध जैसा कि इसका स्थान नाम एवं मन्दिर बताता है।

अगस्त्य नाम के ऋषि से था, जिसने सम्भवतः पर्वत पाषाण से अवरूद्ध, मन्दाकिनी के जल से बनी झील को निकास मार्ग प्रदान किया होगा। अगस्त्यमुनि का मन्दिर अगस्त्येश्वर महादेव का है। जिसमें लिंग के बायीं ओर हर-गौरी की सुन्दर पाषाण मूर्तियाँ हैं। इस मन्दिर में एक अति प्राचीन ताँबे की मूर्ति है, जो लगभग तीन गुणा डेढ़ फीट आकार की है। सिर जटाजूट चाँदी के मुकुट से ढका रहता है। इस मूर्ति के समीप ही एक ओर पीतल की मूर्ति है, जिसकी चमक उल्लेखनीय है।
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लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

Bhanu Bangwal

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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।