July 1, 2022

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जानिए उत्तरकाशी जिले के खूबसूरत पर्यटन स्थलों के बारे में, जहां खो जाओगे प्रकृति के नजारों में

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उत्तरकाशी जिला जहां सांस्कृतिक व धार्मिक गतिविधियों में समृद्ध है। वहीं, इस जिले में खूबसूरत पर्यटन स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षत करते हैं। यहां प्रकृति ने सुंदरता बिखेरी हुई है। पर्वत, नदी, झरने, झील, हरे भरे जंगल से सब नजारे यहां देखने को मिलते हैं। कई स्थल तो ऐसे हैं, जहां तक पहुंचने का रोमांच ही अद्भुत है। यहां उत्तरकाशी जिले के ऐसे ही स्थलों के बारे में बताया जा रहा है।
धरासू
उत्तरकाशी जनपद का यह प्रमुख स्थान हरिद्वार से 146 किलोमीटर दूर तथा 3418 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यह क्षेत्र गंगोत्री एवं यमनोत्री यात्रा घाटी का एक प्राचीन प्रख्यात पड़ाव है। यह स्थान धार्मिक, ऐतिहासिक एवं व्यापारिक केन्द्र भी है। धरासू भगीरथी के दायें क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र में वन सम्पदा अति ही घनी है।
नाचिकेता ताल
यह ताल धनारी पट्टी के पंचाण गाँव एवं फोल्ड गाँव के मध्य स्थित है। उत्तरकाशी-लम्बगाँव मार्ग पर चौरंगीखाल तक 28 किलोमीटर के मोटर मार्ग के पश्चात् 4.5 किलोमीटर पैदल चलकर नचिकेता ताल पहुँचा जाता है। बाँज- बुरांश के सघन वृक्षों के मध्य स्थित यह ताल चित्ताकर्षक है। यह सदैव जलपूरित रहता है।
डोडीताल
उत्तरकाशी से गंगोत्री मार्ग पर दो किलोमीटर मोटर मार्ग तयकर गंगोरी नामक रमणीक स्थान आता है, यहाँ पर असी नदी और भागीरथी का संगम है। गंगोरी से असी नदी के बायें किनारे का मार्ग डोडीताल की ओर जाता है। मार्ग में उत्तरी ग्राम और कुछ किलोमीटर की दूरी पर कौल्डियाणी का मैदान मिलता है। यह मखमली घास का मैदान असी नदी के बायें पक्ष में स्थित हैं कुछ दूर सीधी चढ़ाई के उपरान्त गजोली गाँव के समीप एक छोटी सी नदी है।


इसे पार कर लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर इस मार्ग का अन्तिम गाँव अगोड़ा है। अगोड़ा से कुछ ही दूरी पर प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर डोडीताल है। यह ताल 10,000 फीट की ऊँचाई पर षट्कोणीय है। ताल की परिधि एक किलोमीटर से अधिक है। ताल का जल स्वच्छ और नीलिमा लिये हुए हैं। ताल के दक्षिण किनारे पर एक शिव मंदिर है। इस ताल के वन में मृग, स्नोलैपर्ड, कस्तूरा पशु व मोनाल पक्षी भी देखने को मिलते हैं।


दयारा
उत्तरकाशी से गंगोत्री मार्ग पर 29 किलोमीटर दूर भटवाड़ी तक मोटर मार्ग एवं इससे आगे रैथल गाँव होते हुए 18 किलोमीटर के पैदल मार्ग के पश्चात् दयारा नामक अत्यन्त आकर्षक स्थान है। यहाँ बहुत ही सुन्दर मखमली घास का विस्तृत मैदान है। वसन्त ऋतु में चारों ओर वनस्पतियों और रंग-बिरंगे फूलों की महक से यह स्थान अनुपम आभा लिये होता है। शीतकाल में हिमपात हो जाने पर तो यहाँ के घास के मैदान बर्फ की चादर ओढ़ लेते हैं स्कीइंग के लिए यह उत्तम स्थली है। हर साल ‘अंडूड़ी’ मनाने के लिए लोगों को रैथल से सात किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़ने के बाद दयारा तक पहुंचना होता है। यह घास का एक मैदान है। ऐसे मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। ‘अंडूड़ी’ मुख्यतः दयारा बुग्याल में ही मनाया जाता है। इसे बटर फेस्टीवल भी कहते हैं और यहां लोग मक्खन से होली खेलते हैं।


मांझीवन
इस स्थान पर पहुँचने के लिए देहरादून से पुरोला, मोरी, नौटवाड़ होकर 215 किलोमीटर मोटर मार्ग के पश्चात् पंचगाई होकर 38 किलोमीटर पैदल यात्रा तय करनी होती है। उत्तरकाशी के टॉस-यमुना क्षेत्र में मांझीवन प्राकृतिक सौन्दर्य और झीलों से भरा है। मांझीवन से एक किलोमीटर आगे हिमरेखा पर चलते 19190 फीट की ऊँचाई में भराड़सार ताल प्राकृतिक झील है। इस झील को लोग देवता का सिर अथवा इन्द्रपुरी भी कहते हैं।
इस ताल का निकटवर्ती क्षेत्र मीलों लम्बा ठलुआ मैदानों और घाटियों से भरा है। ग्रीष्मकाल में यह घाटियां और मैदान मखमली घास और विविध पुष्पों से भर जाते हैं। इस सुरम्य बुग्याल मांझीवन से लौटते समय भराड़सर ताल होकर डेल्टाधार और फिर पंचगाई पट्टी की कौरव धरती को छोड़कर फतेपर्वत के रूपिन तट पर पाण्डव धरती का अनुसरण कर रूपीन नदी के दायें तट पर बसे द्रोणी गाँव पहुँचा जाता है। द्रोणी से एक किलोमीटर उत्तर में लगभग हजार फीट ऊँचा द्रोणी झरना देखने को मिलता है। द्रोणी से रूपिन तट होकर बारह किलोमीटर पैदल यात्रा के बाद रूपिन-सूपिन नदियों के संगम पर पोखू देवता का मंदिर है। मंदिर से थोड़ा ही आगे नैटवाड़ मोटर मार्ग है, जहाँ से पर्यटक देहरादून, उत्तरकाशी, मसूरी आदि स्थानों को जा सकता है।
गोमुख
मानव समाज उस जलधारा को पवित्र मानता है जो हिमगिरि श्रृंग गंगोत्री की हिमगिरि गुहा से निकलती है क्योंकि इस गुहा की मुखाकृति गोमुख के समान है। भगीरथी की धारा का वास्तविक उद्गम गोमुख हिमानी है।। यह स्थान हरिद्वार से 300 किलोमीटर तथा समुद्र तल से 12700 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। गंगोत्री से यह स्थान 20 किलोमीटर उत्तर में है। यहाँ पहुँचने का पैदल मार्ग दुर्गम है। गंगोत्री से गोमुख की ओर चलने पर पहले चीरवासा नामक स्थान आता है। यहाँ चौड़ वृक्षों का घना जंगल है।चीरवासा के आगे चलने पर भोजवृक्षो का वन मिलता है।


भोजवासा नामक स्थान में निगमच एक साधुबाबा का रात्रि विश्राम स्थल है। गोमुख का दृश्य वस्तुतः स्वर्गीय और वर्णनातीत है। भगीरथ शिखर और शिवलिंग शिखर के मूल में अर्धचन्द्राकार हिमनियों के मध्य में से भगीरथी की भव्य धारा वेग से गर्जन करती हुई उत्पन्न होती है। यहाँ धारा की सामान्य चौड़ाई 20 फीट तथा गहराई 5 फीट के लगभग होती, परन्तु वेग के कारण इसे पार करना सम्भव नहीं है। ग्रीष्मऋतु में भगीरथी धारा की जल मात्रा अधिक बढ़ जाती है।
पटांगण
गौरीकुण्ड से लगभग डेढ़ किलोमीटर नीचे समतल शिलाओं का मैदान सा है। कहा जाता है कि गोत्र हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए पाण्डव यहाँ तप करने आये थे। यहीं पर रूद्र गंगा का भागीरथी में संगम है। यहां एक विशाल गुफा है, जिसको रूद्र गुफा कहते हैं।
भैरों घाटी
मोक्षदायिनी भागीरथी, अपने उद्गम स्थल गोमुख, गंगोत्री और गौरीकुण्ड से लगभग 36 किलोमीटर की यात्रा करती हुई भैरों घाटी नामक क्षेत्र में प्रवेश करती है। यह क्षेत्र सागरतल से लगभग 9500 फीट की ऊँचाई घर तथा हरिद्वार से 271 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ जाड़ गंगा और भागीरथी का संगम स्थल है। यहाँ संगम क्षेत्र में एक शीतल जल स्त्रोत है। इस जल का स्वाद सोडा वाटर के समान है। इस जल के विषय में चिकित्सकों का मत है कि यह जलधारा भूमि के अन्दर से लोहे की खान से निकलकर आती है। इसके सेवन करने से उदर रोग निर्मूल समाप्त हो जाते हैं।
भैरों घाटी अपने नाम का सार्थक स्वरूप है। इसका प्राकृतिक स्वरूप एवं वातावरण अति अद्भुत और भय पैदा करने वाला है। इसका कारण यह है कि इस क्षेत्र में भगीरथी अति संकरी घाटी में बहती है और आवागमन का मार्ग ऊँचे स्थान से होकर जाता है। जब भगीरथी पर लोहे का पक्का पुल नहीं था, उस समय यहाँ से गंगोत्री जाने हेतु एक लोहे की रस्सी का झूला था, जिस पर यात्री बैठकर पार जाता था। जिसको देखकर प्राय: कई यात्री भय के मारे गंगोत्री धाम जाने से वंचित रह जाते थे।
हर्षिल
यह स्थान समुद्रतल से 8000 फीट की ऊँचाई तथा हरिद्वार से 255 किलोमीटर की दूरी पर
उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग पर अवस्थित है। यह हरिशिला का अपभ्रंश है। विष्णु ने यहाँ पर शिला का रूप धारण किया था। यहाँ उत्तरकाशी क्षेत्र के समान त्रिवेणी है। इस क्षेत्र में दो नदियाँ कंकोड़ा गंगा और जालंधरी गंगा, भागीरथी से भेंट करती है। हरसिल की ख्याति प्राकृतिक सम्पदा के साथ अंग्रेज शिकारी विल्सन का निवास स्थान होने के कारण भी है।


विल्सन 1840 के लगभग गढ़मुक्तेश्वर से गंगा के किनारे पैदल चलकर यहाँ पहुँचा था। इस क्षेत्र से वह पशु-पक्षियों का शिकार कर उनकी खालें मूसरी अंग्रेज व्यापारियों को बेचता था। बाद में उसने टिहरी के राजा से जंगलों की कटाई का ठेका लेकर, नदी से लकड़ियों के स्लीपर बहाकर हरिद्वार भेजने लगा। हिमालय के वनों का व्यवसायिक स्तर पर कटान की परम्परा विल्सन ने ही डाली। 1864 में बनाया हुआ विल्सन का बंगला अब अस्तित्व में नहीं है। देवदार की लकड़ी के मोटे मोटे खम्भों पर टिका यह बंगला स्थानीय कारीगरी और परिवेश के साथ मेल खाने वाली स्थापत्य कला का नमूना था।
गंगनाड़ी
हरिद्वार से 226 किलोमीटर की दूरी तथा समुद्र सतह से 7038 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ एक जल प्रपात है, जो लगभग पचास फीट की ऊँचाई से मोटर मार्ग के समीप गिरता है, दर्शनीय है। इस स्थान पर पराशर ऋषि के आश्रम होने कारण इस स्थान का पुराणों में भी उल्लेख है। पुल पार करके एक तप्त कुण्ड है, जिसे ऋषि कुण्ड कहते हैं। स्त्रोत के पास जल का तापमान 132 डिग्री रहता है परन्तु कुण्ड में आ जाने पर 119 डिग्री रह जाता है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस कुण्ड में प्रतिदिन स्नान करने से गठिया रोग समाप्त हो जाता है।


हर-की-दून
यह स्थान जनपद उत्तरकाशी में 11767 फीट की ऊँचाई में एक वृहत्त बुग्याल है, जहाँ विविध प्रकार के फूल व वन सम्पदा का अतुल भंडार है। देहरादून से हर-की-दून जाने हेतु, देहरादून-नैटवाड़ मोटर मार्ग सर्वोत्तम है। यहाँ से नैटवाड़ की दूरी 176 किलोमीटर है। नैटवाड़ से तालुका तक का 23 किलोमीटर मार्ग कच्चा है, अत: तालुका तक जीप से पहुँचा जा सकता है। तालुका से ओसला का 11 किलोमीटर पैदल मार्ग है। ओसला में रात्रि विश्राम की सुविधा है। हर-की-दून 8 किलोमीटर की दूरी पर है। हर की दून रॅवाई परगने की पट्टी पंचगाई स्थित फतेह पर्वत में मनोहारिणी फूलों की घाटी के रूप में ख्याति प्राप्त किये हुए है। यह घाटी 8 किलोमीटर के विस्तार में फैली हुई है। बन्दरपूँछ पर्वत की तलहटी पर यह अद्भुत पुष्पघाटी है।
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लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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