भारत के इन दो राज्यों में विपरीत दिशा में घूमती है घड़ी की सुईं, घड़ी को जब हाथ में बांधा तो उड़ाया गया मजाक
समय देखने के लिए आप जिस घड़ी का इस्तेमाल करते हो, उसकी सुईं हमेशा वाएं से दाएं की ओर घूमती है। वहीं, भारत में दो राज्य ऐसे भी हैं, जहां घड़ी की सुईं एंटी क्लाकवाइज (आम घड़ी की सुईं के विपरीत दिशा में) घूमती है। ये राज्य भारत के छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश हैं। जहां के कुछ हिस्सों में गोंड जनजाति (Gond tribe) के लोग एंटी-क्लॉकवाइज (घड़ी की सुई के विपरीत दिशा में) घूमने वाली घड़ी का उपयोग करते हैं। यह घड़ी बेहद खास है। क्योंकि इस घड़ी की सुई दाएं से बाएं घूमती है। इसके उलट आम लोग जो घड़ी का प्रयोग करते हैं वह बाएं से दाएं घूमती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में विपरीत दिशा में घुमने वाली घड़ी
बताया तो ये जाता है कि इस घड़ी की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य में कोरबा के मानिकपुर से हुई। अब तक 18 जिलों में यह घड़ी का प्रसार हो गया है। यह कमाल जिले के आदिवासी वर्ग से आने वाले गणेश मरपच्ची ने किया है। जीवन के एक पड़ाव पर जब समय ने उन्हें धोखा दिया था। तब उन्होंने तय किया की क्यों न समय की दिशा को ही बदल दिया जाए। सामान्य जीवन और दुनिया के अनुसार आदिवासियों की यह घड़ी उल्टी है, लेकिन समय सही बताती है। इसके अतिरिक्त, उज्जैन (MP) में वैदिका घड़ियाँ भी स्थापित की गई हैं, जो पारंपरिक ‘वैदिक पंचांग’ के अनुसार समय दिखाती हैं और सूर्योदय से शुरू होती हैं। यह सामान्य रूप से एंटी-क्लॉकवाइज वाली जनजातीय घड़ियों से अलग है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
प्रकृति के प्रति सम्मान से जुड़ी है परंपराएं
गोंड जनजाति और उनकी पारंपरिक ‘उल्टी घड़ी’ (गोंडवाना समयचक्र) का इतिहास प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान और जीवन दर्शन से जुड़ा है। यह घड़ी आम घड़ियों की तरह बाएं से दाएं (clockwise) नहीं, बल्कि दाएं से बाएं (anti-clockwise) चलती है।
प्राचीनता: गोंड भारत के सबसे बड़े और प्राचीन आदिवासी समूहों में से एक हैं, जो संभवतः 2000 ईसा पूर्व के आसपास भारत में बसे।
गोंडवाना शासन: 13वीं-16वीं शताब्दी के दौरान इन्होंने मध्य भारत में शक्तिशाली राज्य स्थापित किए, जिनमें संग्राम शाह का शासनकाल प्रमुख था।
संस्कृति: ये मुख्य रूप से प्रकृति के पूजक हैं और इनका अपना अनूठा दर्शन है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
गोंड मान्यता और घड़ी की सुई का इतिहास
गोंड मान्यता के अनुसार, प्रकृति का चक्र जिस दिशा में काम करता है, वे उसके विपरीत नहीं चल सकते। ग्रहों, नक्षत्रों और प्रकृति का संचलन दाएं से बाएं होता है, इसलिए गोंडवाना समयचक्र की सुई भी इसी दिशा में घूमती है। आदिवासियों का मानना है कि पृथ्वी भी एंटी क्लॉक वाइज चलती है। साथ ही पेड़ो पर चढ़ने वाली बेल भी इसी दिशा में पेड़ पर आगे बढ़ती है। सूर्य चंद्रमा भी इसी दिशा में गति करते हैं। ऐसे मैं सभी चीज जब विपरीत दिशा में हैं तो घड़ी भी इसी दिशा में चलनी चाहिए। यहां के लोग प्रकृति को अपना देवता मानते हैं इसीलिए उनके घरों में जो गाड़ियां होती हैं वो उलटी दिशा में चलती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
दार्शनिक आधार: यह घड़ी केवल समय नहीं बताती, बल्कि जीवन जीने का विधान सिखाती है। उनका मानना है कि वर्तमान विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है, जबकि यह उल्टी घड़ी सही दिशा में चलने की सीख देती है।
निर्माण और मान्यता: यह “गोंडवाना समयचक्र” (Gondwana Clock) प्राकृतिक तत्वों के आधार पर तैयार किया गया है और यह उनके सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है।
पहचान: इस प्रकार की घड़ी छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में गोंड आदिवासियों द्वारा उपयोग की जाती है।
संक्षेप में, गोंडवाना समयचक्र (उल्टी घड़ी) प्रकृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान दर्शाने का एक प्रतीक है, जो यह याद दिलाता है कि जीवन को प्रकृति के अनुसार चलना चाहिए, न कि प्रकृति को जीवन के अनुसार।
घड़ी की दिशा: यह घड़ी दाएं से बाएं (right to left) चलती है।
उद्देश्य: यह घड़ी गोंडवाना समुदाय की पारंपरिक मान्यताओं का प्रतीक है, जिसे वे “प्राकृतिक दिशा” मानते हैं।
संस्कृति: इस क्षेत्र में शादी के सात फेरे भी एंटी-क्लॉकवाइज ही लिए जाते हैं।
मान्यता: वे मानते हैं कि प्रकृति (जैसे लताएं, बैल, पूजा) दाएं से बाएं घूमती है। यही नहीं, शादी के दौरान जब फेरे लिए जाते हैं तो दाएं से बाएं ही लिए जाते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
घड़ी का आविष्कार
घड़ी (clock) का सर्वप्रथम आविष्कार किसी एक देश द्वारा नहीं हुआ था। घड़ी के विकास और उपयोग का इतिहास काफी पुराना है और इसमें कई युगों के दौरान विभिन्न संस्कृतियों और देशों ने योगदान दिया है। प्राचीनतम घड़ी की प्रकृति बहुत सरल थी और उसे सूर्यास्त और चंद्रमा के आधार पर समय की गणना करने के लिए उपयोग किया जाता था। इसके अलावा, जल घड़ी, रेत की घड़ी, मोम की घड़ी, पानी की घड़ी, और अन्य प्राकृतिक तत्वों का उपयोग समय मापने के लिए किया जाता था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इन देशों से हुआ विकास
मानव ने घड़ी के विकास के लिए नवीनतम और अधिक प्रभावशाली तकनीकों का उपयोग किया है। यह प्रक्रिया समय के साथ साथ विभिन्न संस्कृतियों के बीच संगठित हुई है। उदाहरण के लिए, संग्राहलयों और इतिहासकारों द्वारा पाए गए शेषांशों से पता चलता है कि चीन, मिस्र, ग्रीस, रोम, भारत, और अरब देशों में प्राचीनकाल में घड़ी के विकास के विभिन्न प्रकार मौजूद थे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भारत में सूरज की छाया का उपयोग
सूरज की छाया का उपयोग कर समय बताने वाली घड़ियाँ शायद भारत में लंबे समय से देखी गई हैं। लगभग सवा दो हज़ार साल पहले प्राचीन यूनान यानी ग्रीस में पानी से चलने वाली अलार्म घड़ियाँ हुआ करती थीं, जिममें पानी के गिरते स्तर के साथ तय समय बाद घंटी बज जाती थी। वहीं, आधुनिक घड़ी के आविष्कार का मामला कुछ पेचीदा है। घड़ी की मिनट वाली सुई का आविष्कार वर्ष 1577 में स्विट्ज़रलैंड के जॉस बर्गी ने अपने एक खगोलशास्त्री मित्र के लिए किया। उनसे पहले जर्मनी के न्यूरमबर्ग शहर में पीटर हेनलेन ने ऐसी घड़ी बना ली थी, जिसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया सके। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
घड़ी को रस्सी से हाथ में बांधा तो उड़ाया मजाक
वहीं, जिस तरह हम आज हाथ में घड़ी पहनते हैं वैसी पहली घड़ी पहनने वाले आदमी थे जाने माने फ़्राँसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल। ये वही ब्लेज़ पास्कल हैं, जिन्हें कैलकुलेटर का आविष्कारक भी माना जाता है। लगभग 1650 के आसपास लोग घड़ी जेब में रखकर घूमते थे, ब्लेज़ पास्कल ने एक रस्सी से इस घड़ी को हथेली में बाँध लिया ताकि वो काम करते समय घड़ी देख सकें। उनके कई साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया, लेकिन आज हम सब हाथ में घड़ी पहनते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
किसी एक ने नहीं किया आविष्कार
घड़ी के आविष्कार का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है। घड़ी के विकास में कई लोगों ने योगदान दिया है। प्राचीन काल में लोग समय का पता लगाने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते थे। उदाहरण के लिए, वे सूर्य की स्थिति, पानी के बहाव और खगोलीय घटनाओं का उपयोग करते थे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पहली यांत्रिक घड़ी का आविष्कार चीन में 200 ईस्वी पूर्व में हुआ था। यह घड़ी पानी से चलती थी और इसमें एक पतली छड़ होती थी जो पानी के बहाव के साथ घूमती थी। 13वीं शताब्दी में, यूरोप में यांत्रिक घड़ी का आविष्कार हुआ। इन घड़ियों में पेंडुलम का इस्तेमाल किया जाता था, जो समय को अधिक सटीक रूप से मापने में मदद करता था। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
15वीं शताब्दी में, जर्मनी के पीटर हेनलेन ने पहली पोर्टेबल घड़ी का आविष्कार किया। यह घड़ी एक पेंडुलम का इस्तेमाल करती थी और इसे एक चेन से लटका कर पहना जा सकता था। 16वीं शताब्दी में, स्विट्जरलैंड में घड़ी निर्माण उद्योग का विकास हुआ। स्विस घड़ियाँ अपनी उच्च गुणवत्ता और सटीकता के लिए प्रसिद्ध थीं। 19वीं शताब्दी में, घड़ी में कई महत्वपूर्ण विकास हुए। इनमें से एक विकास था क्वार्क घड़ी का आविष्कार। क्वार्क घड़ी अब तक की सबसे सटीक घड़ी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
आधुनिक घड़ी
आज, घड़ी एक आम उपकरण है जिसका उपयोग हम समय का पता लगाने के लिए करते हैं। घड़ियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं, जिनमें यांत्रिक घड़ियाँ, क्वार्ट्ज घड़ियाँ और इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ शामिल हैं। इस प्रकार, घड़ी के आविष्कार का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है। घड़ी के विकास में कई लोगों ने योगदान दिया है।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


