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July 21, 2026

होली गीत: कलयुग भाई क्यों बैरी, लेखक-ललित मोहन गहतोड़ी

अच्हारे लड़कों कलयुग भाई क्यों बैरी।। टेक।।
कैसी अधर्म की जीत…लड़को कलयुग भाई क्यों बैरी
बचपन में तब लाड़ से खेले।। 2।।
पचपन आते द्वेष… लड़को कलयुग भाई…
दो पल बीते आई जवानी।। 2।।
व्याहन गूंजे गीत… लड़को कलयुग भाई…
माता पिता की सेवा तज दी।।2।।
तज दी शर्म अनेक…लड़को कलयुग भाई… (जारी, अगले पैरे में देखिए)

अपनी ही अब बात मनाते।। 2।।
खटके भाई जीत… लड़को कलयुग भाई…
भाई मिलते हैं किस्मत के।। 2।।
बहिन पराए देश…लड़को कलयुग भाई…
मात पिता होते जनम के साथी।। 2।।
करम तेरे परलोक…लड़को कलयुग भाई…
भाई भाई सुखी रहें तब।। 2।।
समय के रहते चेत… लड़को कलयुग भाई…
मानष युग युग होली गावै।। 2।।
छोड़ सभी राग द्वेष….लड़को कलयुग भाई…
रचनाकार का परिचय
रचनाकार ललित मोहन गहतोड़ी काली कुमाऊं चंपावत से प्रकाशित होने वाली वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक फुहारें के संपादक हैं। वह जगदंबा कालोनी, चांदमारी लोहाघाट जिला चंपावत, उत्तराखंड निवासी हैं।
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