Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

June 28, 2026

गढ़वाली कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’ की गजल- पुरखौं धरौंण

गढ़वाली कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’ की गजल- पुरखौं धरौंण।

पुरखौं धरौंण

यो पाऽण हम थैं, खुज्यांणा छीं.
अफ वख-हम यख, रुलांणा छीं..

बोलि नी पांदा, कबि भी गिचन,
ज्यू थैं अपणा, अफी दुखांणा छीं..

रव्वे – रव्वे कि, हमरी यादों मा,
रड़दीं- बगदी, आंसु बुगांणा छीं..

को समझलु, यूंकि ज्यू कि पिड़ा,
अपड़ा ज्यू थैं, अफी बुथ्यांणा छीं..

क्वी त सूणां, यूं कि- दिला बात,
यो पाऽण हमरा , रूंद जांणा छीं..

पाऽणा चुलंठ्यूं बटि, द्यवता धध्यंदीं,
अपड़ा ठौ-ठौर, अपड़ौं बुलांणा छीं..

बरसों बटि खणा, इकटकी द्यखणा,
घैनै कु बौणा, यी त समझांणा छीं..

‘दीन’ ! यूँ पाऽणौं से, पुरखों नातु रै,
जांण ! ऊंकि धरौंण, क्य-बिंगांणा छीं..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।

Bhanu Bangwal

लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।