भूमाफियाओं और तहसील प्रशासन के खिलाफ सीपीएम का विकासगर तहसील पर अनिश्चितकालीन धरना
उत्तराखंड में देहरादून के विकासनगर क्षेत्र में भूमाफियाओं और जिला प्रशासन पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए सीपीएम ने तहसील कार्यालय के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया। साथ ही अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया। आरोप है कि प्रशासन और भूमाफियाओं की मिलीभगत से किसानों की जमीन खुर्दबुर्द की जा रही है। इस अवसर पर अध्यक्ष राजस्व परिषद, अपर पुलिस महानिदेशक, जिलाधिकारी देहरादून सहित पीएसीएल से सम्बन्धित जस्टिस लोडा कमेटी को ज्ञापन प्रेषित किया गया। प्रदर्शन की सूचना के बावजूद उपजिलाधिकारी, तहसीलदार विकासनगर तहसील से नदारद रहे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की मांग है कि पीएसीएल प्रकरण का समाधान, प्रस्तावित बल्लूपुर -पांवटा राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच -72 मुआवजा वितरण में अनियमिताओं को दूर करने, भूमाफियाओं द्वारा जनपद के अनेक भागों में खासकर विकासनगर तहसील के अन्तर्गत तहसील प्रशासन की मिलीभगत से ग्राम समाज की भूमि, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों भूमि तथा जलमग्न श्रेणी की भूमि को खुर्दबुर्द करने की उच्चस्तरीय जांच की मांग कराई जाए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस अवसर पर आयोजित वक्ताओं ने कहा है कि भ्रष्टाचार एवं भूमि घोटाले अनेक मामले प्रकाश में आये हैं, किन्तु बार बार धरने, प्रदर्शनों एवं शिष्टमंडलों के अधिकारियों से मिलने के बावजूद प्रशासन हाथ में हाथ धरा बैठा है। पार्टी ने हजार – हजार पेज के दस्तावेज सबूतों के रूप में पेश किये हैं, जो एसपी ग्रामीण तथा जिलाधिकारी कार्यालय में घूल फांक रहे हैं। वक्ताओं ने कहा है कि जब तक कार्रवाई नहीं होती, धरने को खत्म नहीं करेंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने बताया कि पीएसीएल कम्पनी 1983 में बनी थी। इसका मुख्य उद्देश्य निवेशकों की जमा राशि का उपयोग जमीनों को खरीदना व बेचना था। साथ ही अविकसित जमीनों को विकसित करना, खेती योग्य बनाना था। इसका लाभ निवेशकों को भी देना था, किन्तु कम्पनी में अनियमिताओं के कारण 2014 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी ) ने कम्पनी के कारोबार एवं सम्पतियों पर रोक लगा दी थी। पीएसीएल कम्पनी का प्रबन्धन न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सर्वोच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन कम्पनी की करोड़ों करोड़ रूपये की सम्पत्ति पर निगरानी तथा इस सम्पत्ति को बेचकर निवेशकों की बकाया राशि का भुगतान करने के लिए किया था। जहाँ जहाँ कम्पनी की चल अचल सम्पत्ति थी वहाँ -वहाँ के जिलाधिकारियों को सम्पत्ति पर रिसीवर बिठाया गया। उत्तराखंड में कम्पनी की संपत्ति देहरादून, उधमसिंहनगर, टिहरी आदि जनपदों में है। अकेले देहरदून में ही कम्पनी पर छोटे बड़े निवेशकों का लगभग 250 करोड़ रूपया बकाया है। देहरादून में ही सर्वोच्च न्यायालय एवं जस्टिस लोढा कमेटी के आदेशों को दरकिनार करते हुऐ उपनिबंधक विकासनगर तहसील एवं तहसील प्रशासन एवं कम्पनी के अधिकारियों तथा भूमाफियाओं मिलीभगत से उक्त भूमि को बेचा गया। जो कि स्वयं में बहुत बड़ा महाघोटाला है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने कहा कि इस मामले में संपत्ति के रिसीवर जिलाधिकारी भी जबाब देने से कतरा रहे हैं। निवेशकों द्वारा जिलाधिकारी महोदय, पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री से आवश्यक कार्यवाही के अनुरोध किया गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। साथ ही राजमार्ग के नाम पर किसानों की जमीन का समुचित मुआवजा देने की मांग भी की गई। साथ ही ग्राम पंचायतों की जमीन को खुर्द बुर्द करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस अवसर पर सीपीएम के जिलासचिव राजेंन्द्र पुरोहित, किसान नेता एवं पछवादून के सचिव कमरूद्दीन, देहरादून सचिव अनन्त आकाश, सीटू उपाध्यक्ष भगवन्त पयाल, मोहम्मद अकरम, सयुंक्त सचिव रामसिंह भंडारी, किसान सभा उपाध्यक्ष सुधा देवली, अमर बहादुर शाही, पीएसीएल संघर्ष समिति के अध्यक्ष नरेशपाल, सचिव महेंद्र सिंह, रेखा राणा, इस्लाम, डीएस नेगी, गोबिंद सिंह, मन्जू नेगी, गुमान सिंह, डिम्पल गुप्ता, अयाब खान, कुन्दन सिंह, जगदीश, बलबीर, मढाराम, यूसूफ, वहीद, शेरसिंह, शब्बीर, ब्रह्मान्द कोठरी, महेन्द्र सिंह, धर्मपाल, शमीम, त्रूषिपाल शोरण, पालमित्री, नोरतू आदि कार्यकर्ता शामिल थे।



