देख तमाशा हँसता है सच खाना-दाना ढूँढ रहा सच, कलयुग की खलिहानों पर। देख तमाशा हँसता है सच, दो दिन...
साहित्य जगत
घर के बिना झूठ हमसे कहा नहीं जाता। सत्य उनसे सहा नहीं जाता। भले हमारे ख़िलाफ़ हो हवा उसके संग...
गांव नहीं छूटा हमसे आज भी गांव नहीं छूटा। जिस गांव में हमने देखे सपने। उन्हें सच किया वो ग़ैर...
मानव धर्म शिखा मैं हिन्दू हूं वह मुस्लिम है, यह दृष्टि बदल डालो। मानव हो तो मानवता का, दुःख दर्द...
शुक्रवार को देहरादून स्थित एनआईवीएच सभागार में सेव हिमालय मूवमेंट और संवेदना की ओर से आयोजित विद्यासागर सम्मान समारोह में...
गालीबाज संसद शर्मसार हो गई। प्रतिष्ठा तार- तार हो गई। लोकतंत्र की थी जो गरिमा बद होकर बाज़ार हो गई।...
बचपन अपना बचपन बचाके रखना। भूल न जाना बचपन के खेल। पल में झगड़ना पल में मेल। गुड्डा - गुड़िया...
हम रोशनदान हैं! हम दीवार नहीं रोशनदान हैं। हमसे आती है रोशनी घर में। हमारी भाती है उपस्थिति घर में।...
ज़िंदगी कंदील हो गई आईनों के शहर में चेहरों पर नक़ाब है। हवाओं को आने की इजाज़त नहीं है। ताका-झांकी...
आज हिमवंत कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल की पुण्य तिथि एवं हिंदी दिवस का कार्यक्रम हिमवंत कवि चन्द्र कुवर बर्तवाल शोध...
