अंधेर नगरी चौपट राजा, उत्तराखंड सरकार ने दोहरा दी ये कहानी, सब कैटेगिरी का एक ही रेट, कांग्रेस नेता ने की सरकार से नीति बनाने की मांग
एक कहानी है, जिसका नाटक के रूप में मंचन होता है। इस कहानी का नाम है- अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी, टका सेर खा जा। इस कहानी में ये बताया गया कि एक राज्य में ऐसा कानून था कि दुकान में हर सामान का मूल्य एक ही था। एक टका में मिठाई थी तो एक ही टका में सोने के आभूषण। एक टका में हाथी था तो एक टका में मुर्गी या मुर्गे की कीमत। कहानी लंबी है। इसलिए आपको पढ़ना हो तो प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र के इस सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक को आप गूगल में सर्च करके पढ़ सकते हो। अब ये कहानी तो उत्तराखंड में भी चरितार्थ हो गई।
उत्तराखंड में सरकार ने न्यूज़ पोर्टलों के लिए टेंडर प्रक्रिया में इसी कहानी को दोहराया गया है। जिस तरह कहानी में हर चीज की कीमत एक टका थी, उसी तरह हर तरह के विज्ञापन की कीमत एक ही रखी गई है। यानी 728×90 (टॉप), 300×250 (टॉप), 300×600(मीडिल), 970×250 (मिडिल), पांच सेकेंड से लेकर 30 सेकेंड तक, या 30 सेकेंड से लेकर दो मिनट तक के विज्ञापनों में सबका रेट एक ही 1200 रुपये कर दिया गया है। मतलब साफ है कि भिंडी, टमाटर, टिंडा, गोभी, गाजर, मूली हो या फिर सेब, अमरूद, आम हो या अनाज हो, सबकी कीमत समान कर दी गई है। राजा भले ही बदल गया हो, लेकिन फरमान तो वही है, जो कहानी में थे। अब आते हैं काम की बात में। इस विज्ञापन नीति को लेकर प्रतिक्रिया भी खूब आने लगी हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों के लिए टेंडर प्रक्रिया समाप्त कर स्थायी विज्ञापन नीति बनाए सरकार
उत्तराखंड में देहरादून महानगर कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. जसविंदर सिंह गोगी ने पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार से टेंडर प्रक्रिया समाप्त कर एक स्थायी, पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ विज्ञापन नीति लागू करने की मांग कीहै। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था छोटे और स्वतंत्र न्यूज़ पोर्टलों के लिए व्यावहारिक नहीं है। इसलिए विज्ञापन आवंटन की प्रक्रिया को सरल, स्पष्ट और समान अवसर पर आधारित बनाया जाना आवश्यक है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने कहा कि महंगाई के मौजूदा दौर में न्यूज़ पोर्टलों के लिए निर्धारित ₹1,200 प्रतिमाह की विज्ञापन राशि अपर्याप्त है। इससे पहले बैनर और वीडियो वाले एक विज्ञापन की दर 10000 रुपये के करीब थी। वहीं, मीडिल व अन्य विज्ञापन की दर छह हजार रुपये थी। महंगाई के दौर में जब हर वस्तु के दाम बढ़ रहे हैं तो उत्तराखंड सरकार ने इसकी कीमत को 80 फीसद तक कम कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस राशि पर तत्काल पुनर्विचार करते हुए पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों के संचालन, संसाधनों तथा कार्यभार को ध्यान में रखकर उचित विज्ञापन दरें निर्धारित करनी चाहिए। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कांग्रेस नेता डॉ. जसविंदर सिंह गोगी ने कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। छोटे और स्वतंत्र न्यूज़ पोर्टल सीमित संसाधनों के बावजूद स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं और जनहित से जुड़े विषयों को प्रमुखता से सामने लाते हैं। ऐसे संस्थानों के लिए अव्यावहारिक टेंडर प्रक्रिया और अपर्याप्त विज्ञापन राशि उनके अस्तित्व तथा स्वतंत्र पत्रकारिता दोनों को प्रभावित कर सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि पत्रकार संगठनों और न्यूज़ पोर्टल प्रतिनिधियों के साथ संवाद कर नई विज्ञापन नीति तैयार की जाए। नीति में स्पष्ट पात्रता मानदंड, समान अवसर, समयबद्ध भुगतान और अपील की प्रभावी व्यवस्था शामिल होनी चाहिए। सरकार को पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों के लिए टेंडर आधारित अस्थायी व्यवस्था समाप्त कर पारदर्शी, स्थायी और समान मानकों वाली विज्ञापन नीति लागू करनी चाहिए। ₹1,200 प्रतिमाह की राशि पर तत्काल पुनर्विचार, विज्ञापन आवंटन में समान अवसर और वस्तुनिष्ठ दर निर्धारण पत्रकारिता के सम्मान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
मुख्य मांगें
1. पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों के लिए वर्तमान टेंडर प्रक्रिया समाप्त कर स्थायी विज्ञापन नीति लागू की जाए।
2. ₹1,200 प्रतिमाह की विज्ञापन राशि पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए।
3. विज्ञापन आवंटन में सभी पात्र पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों को समान अवसर सुनिश्चित किया जाए।
4. विज्ञापन दरें प्रसार, पहुंच, सामग्री की गुणवत्ता, नियमितता और डिजिटल प्रभाव जैसे स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर तय की जाएं।
5. छोटे और स्वतंत्र न्यूज़ पोर्टलों के लिए सरल, पारदर्शी और मानकीकृत पंजीकरण एवं विज्ञापन व्यवस्था बनाई जाए।
6. विज्ञापन आवंटन और भुगतान प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक की जाए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
7. पत्रकारों के सम्मान, अधिकारों और स्वतंत्र कार्यप्रणाली को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन नीति की व्यापक समीक्षा की जाए।
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