युवा कवयित्री अंजली चंद की कविता- अंतर्मन का वाद विवाद
अंतर्मन का वाद विवाद एक जंग है
जिसने इसे पढ़ा नहीं
वो जीवन की कठिनाइयों को समझा ही नहीं
अरे कोई बात नहीं
सह लो ना थोड़ा ओर
सह जाने से मर थोड़ी जाओगे
असल में जो सह रहा है
वो तो मर चुका है
जिंदा आदमी तो छटपटा जाएगा (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
उम्मीद का टूट जाना,
सपनों का छूट जाना
असल में जब इंसान मर जाता है ना
तभी से जीना सीख जाता है
जिसने कभी कुछ खोया ही नहीं
जो कभी मुसीबतों से टकराया ही नहीं
जो अपनों से पराया हुआ ही नहीं
जो परायों से धोखा खाया ही नहीं
जो छला गया हो अंतर्मन से
बाहर से कलंकित हुआ हो ,
जो लड़ा नहीं खुद से
जिसका बस एक दिन बुरा गया हो
उसने एक बुरा दौर देखा ही नहीं
जो छोटी छोटी मुसीबतों का बखान कर लें
मुसीबतों के सैलाब में गोता लगाया ही नहीं (कविता जारी, अगले पैरे में देखिए)
वर्चस्व अपना त्यागकर भी
जो स्वयं को बचा पाया ही नहीं
गुलाब की पंखुड़ी सी कोमलता खुद में समाकर
उसकी कांटो सा चुभने वाला बागी बन जाना
निर्लज्ज हो जाए नजरों में सबके
अपने खालीपन का बखान कर पाए ही नहीं
जिसने कभी कुछ पाया ही नहीं
पाए बिना जो सबकुछ खो चुका हो
वो प्राणी मात्र है उसने
जिंदगी को जिया ही नहीं
जिसने कभी कुछ खोया ही नहीं
अंतर्मन का वाद विवाद एक जंग है
जिसने इसे पढ़ा नहीं
वो जीवन की कठिनाइयों को समझा ही नहीं ।।
कवयित्री की परिचय
नाम – अंजली चंद
बिरिया मझोला, खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


