अब रात में भी धरती पर सूरज की रोशनी की तैयारी, बेची जाएगी रात को धूप
हम जिस असंभव बात को कल्पना कल्पना कहते हैं, कई बार ऐसी कल्पना साकार होने लगती है। ऐसी ही एक कल्पना कीजिए कि रात के नौ बजे हैं। शहर में अंधेरा है। फिर अचानक किसी सोलर फार्म पर अचानक दिन जैसा उजाला हो जाता है। न कोई सूरज उगा है। न कोई बिजली का बल्ब जला है। यह रोशनी सीधे अंतरिक्ष से आ रही है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसी बात सुनने में साइंस फिक्शन लगती है, लेकिन अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में एक स्टार्टअप इसे हकीकत बनाने की कोशिश कर रहा है। इस कंपनी का नाम रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल (Reflect Orbital) है। कंपनी रात में भी आपकी छत पर दिन जैसी रोशनी लाने के प्रयास कर रही है। प्रयास है कि सोलर पैनल लगातार काम करें और शहर कभी अंधेरे में न डूबे। यह सपना अब वास्तविकता बनने की कगार पर है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इसके तहत अमेरिका की स्टार्टअप कंपनी Reflect Orbital ने एक ऐसा सैटेलाइट सिस्टम बनाने की योजना बनाई है, जो अंतरिक्ष से धरती पर सीधे सूरज की रोशनी भेजेगा। कंपनी इसे सनलाइट ऑन डिमांड सिस्टम कहती है और दावा करती है कि इसका मकसद सोलर फार्म्स को रात में भी बिजली देना है। कंपनी का दावा है कि वह अंतरिक्ष में विशाल दर्पण वाले सैटेलाइट भेजेगी, जो सूरज की रोशनी को पृथ्वी पर वापस प्रतिबिंबित करेंगे। मतलब, रात में भी सूरज की रोशनी “ऑर्डर” की जा सकेगी। हां। कंपनी कहती है कि आप इसे मोबाइल ऐप से बुक भी कर सकेंगे। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसे आएगी अंतरिक्ष से रोशनी
Reflect Orbital इसी साल यानी 2026 में Earendil-1 नामक 18 मीटर लंबा टेस्ट सैटेलाइट लॉन्च करने वाली है। इनमें विशाल रिफ्लेक्टिव मिरर लगे होंगे। ये दर्पण अंतरिक्ष में सूर्य की रोशनी पकड़ेंगे और उसे पृथ्वी पर किसी खास जगह की ओर मोड़ देंगे। यह प्रोजेक्ट 2030 तक 4000 सैटेलाइट्स के नेटवर्क में बदल जाएगा। हर सैटेलाइट के पास 54 मीटर चौड़ा मिरर होगा, जो सूरज की रोशनी को किसी भी हिस्से पर फोकस कर सकेगा। कंपनी कहती है कि रोशनी की तीव्रता सिर्फ दोपहर की धूप का 20 प्रतिशत होगी, ताकि सोलर पैनल सक्रिय रहें, लेकिन अंधेरा पूरी तरह न मिटे। इस तकनीक का आइडिया हैरान करने वाला है, लेकिन सिद्धांत बहुत सीधा है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इतना हो सकता है रोशनी का दायरा
रोशनी का दायरा लगभग 5 किलोमीटर तक हो सकता है। इसकी चमक को कंट्रोल भी किया जा सकता है। कभी फुल मून जैसी हल्की रोशनी तो कभी दोपहर जैसी तेज रोशनी। सैटेलाइट को घुमाकर रोशनी को चालू और बंद किया जा सकेगा। यानी, जैसे आप बिजली का स्विच ऑन करते हैं, वैसे ही “सूरज” को ऑन किया जा सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
असली लक्ष्य रात में भी सोलर बिजली का उत्पादन करना
इस तकनीक का सबसे बड़ा इस्तेमाल सोलर ऊर्जा में देखा जा रहा है। दुनिया भर में सोलर ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या वही पुरानी है। सूरज ढलते ही सोलर से बिजली उत्पादन खत्म हो जाता है। अगर रात में भी सोलर पैनल पर रोशनी पड़े, तो बिजली उत्पादन कई घंटों तक बढ़ सकता है। कंपनी का दावा है कि भविष्य में इससे सोलर प्लांट की क्षमता करीब 20% तक बढ़ाई जा सकती है। मतलब, शाम और रात के शुरुआती घंटों में भी सोलर बिजली मिल सकती है, जब बिजली की मांग अक्सर सबसे ज्यादा होती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक हजार सैटेलाइट का प्लान
यह अभी शुरुआती चरण में है। कंपनी ने अभी तक कुछ प्रोटोटाइप दर्पण बनाए हैं, जिनका आकार लगभग 18 मीटर तक है। इन्हें ऊंचे गुब्बारों के जरिए टेस्ट भी किया गया है। असली योजना बहुत बड़ी है। 2028 तक 1000 सैटेलाइट और 2030 तक लगभग 5000 सैटेलाइट की योजना है। भविष्य में कंपनी ऐसे दर्पण बनाने की बात कर रही है जिनका आकार 180 फुट तक हो सकता है। अगर यह नेटवर्क बन गया, तो अंतरिक्ष में एक तरह की “रोशनी की फ्लीट” तैयार हो जाएगी। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सवाल ये है कि क्या यह सच में काम करेगा
कई वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष से भेजी गई रोशनी की ताकत अभी बहुत सीमित है। कुछ शुरुआती गणनाओं के अनुसार, एक सैटेलाइट से मिलने वाली रोशनी दोपहर के सूरज से लाखों गुना कम हो सकती है। यानी, बड़े पैमाने पर असर डालने के लिए हजारों सैटेलाइट की जरूरत पड़ेगी। फिर आता है सबसे बड़ा सवाल इस योजना के खर्च का है। एक सैटेलाइट की लागत अभी करीब 2 मिलियन डॉलर तक हो सकती है। हालांकि कंपनी कहती है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर यह लागत 1 लाख डॉलर से भी कम हो सकती है। इसके अलावा हर सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने का खर्च अलग है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
बैटरी से मुकाबला
ऊर्जा विशेषज्ञ कहते हैं कि यह तकनीक दिलचस्प जरूर है, लेकिन फिलहाल इसका मुकाबला बैटरी स्टोरेज से है। आज दुनिया भर में सोलर बिजली को स्टोर करने के लिए बड़े-बड़े ग्रिड बैटरी सिस्टम लगाए जा रहे हैं। इनकी खासियत यह है कि बिजली दिन में स्टोर होती है रात में तुरंत इस्तेमाल की जा सकती है, जबकि अंतरिक्ष वाली रोशनी सैटेलाइट के गुजरने पर ही मिल सकती है और कुछ मिनटों के लिए ही। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक शायद बैटरी की जगह नहीं लेगी, बल्कि कुछ खास परिस्थितियों में पूरक तकनीक बन सकती है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
जीव जंतुओं के व्यवहार की वैज्ञानिकों को चिंता
इस तकनीक को लेकर एक और बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। अगर हजारों सैटेलाइट रात में पृथ्वी पर रोशनी भेजने लगे, तो इसका असर रात के प्राकृतिक अंधेरे पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों को डर है कि इससे समुद्री कछुओं का व्यवहार बदल सकता है कीड़े-मकोड़ों और पक्षियों पर असर पड़ सकता है और खगोल विज्ञान यानी तारों का अध्ययन भी मुश्किल हो सकता है। यानी, यह सिर्फ ऊर्जा का सवाल नहीं है। यह पृथ्वी के प्राकृतिक रिद्म का सवाल भी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
एक पागल आइडिया, या भविष्य की ऊर्जा?
इतिहास बताता है कि कई बड़ी तकनीकें कभी “असंभव” लगती थीं। कभी सोलर ऊर्जा भी महंगी थी इलेक्ट्रिक कार भी मजाक लगती थी और निजी रॉकेट भी सपना थे। दो साल पहले साल कंपनी के फाउंडर बेन नोवैक ने 2.5 मीटर चौड़े मिरर को हॉट एयर बैलून पर लगाया और नीचे लगे सोलर पैनल पर धूप फोकस किया। इस टेस्ट में 516 वॉट प्रति वर्ग मीटर की रोशनी मापी गई, जो दोपहर के सूरज की ताकत का करीब आधा है। इससे साबित होता है कि तकनीक काम करती है, लेकिन अंतरिक्ष में चुनौती अलग है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
625 किलोमीटर ऊपर से एक जगह रोशनी फोकस करने के लिए मिरर को 6.5 किलोमीटर लंबा बनाना पड़ेगा, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। कंपनी का कहना है कि सिर्फ 20 प्रतिशत धूप देने के लिए 54 मीटर चौड़े सैटेलाइट से लगभग 3,000 सैटेलाइट्स की जरूरत होगी। यह केवल कुछ मिनटों के लिए। क्योंकि इतनी ऊंचाई पर घूमते सैटेलाइट सिर्फ 3.5 मिनट तक किसी एक जगह पर रह सकते हैं। भविष्य में यदि एक घंटे तक रोशनी चाहिए, तो हजारों और सैटेलाइट्स लगाने पड़ेंगे। आज ये सब हकीकत हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
भविष्य को लेकर सवाल
अब सवाल यह है कि क्या अंतरिक्ष से रोशनी भेजने का यह विचार भी भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का हिस्सा बनेगा। या फिर यह सिर्फ सिलिकॉन वैली का एक चमकदार प्रयोग बनकर रह जाएगा। फिलहाल इतना जरूर तय है कि अगर यह सफल हुआ, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को शायद सूरज का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
नोटः सच का साथ देने में हमारा साथी बनिए। यदि आप लोकसाक्ष्य की खबरों को नियमित रूप से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए गए आप्शन से हमारे फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ सकते हैं, बस आपको एक क्लिक करना है। यदि खबर अच्छी लगे तो आप फेसबुक या व्हाट्सएप में शेयर भी कर सकते हो। यदि आप अपनी पसंद की खबर शेयर करोगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी। बस इतना ख्याल रखिए।

Bhanu Bangwal
लोकसाक्ष्य पोर्टल पाठकों के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें लेख, रचनाएं आमंत्रित हैं। शर्त है कि आपकी भेजी सामग्री पहले किसी सोशल मीडिया में न लगी हो। आप विज्ञापन व अन्य आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।
मेल आईडी-bhanubangwal@gmail.com
भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


