होली मना लेना, चेहरा बचा लेना, छात्राओं को मेहंदी, फूल और अनार के छिलके से रंग बनाने का दिया प्रशिक्षण, भूलकर ना करना ये गलती
जैसा की हमने खबर की हैडिंग में लिखा है कि होली मना लेना, चेहरा बचा लेना। इसका मतलब अब के इंटरनेट युग के पाठकों को पता होगा कि हमने ऐसा क्यों लिखा। क्योंकि कैमिकल रंगों से किसी भी व्यक्ति की त्वचा में कई तरह से रोग पैदा हो जाते हैं। साथ ही होली का रंग कई दिनों से छुटता नहीं है। चेहरे से लेकर शरीर के जिस अंग में ऐसा रंग लगता है, उसे एक सप्ताह तक छुड़ाना भी टेढ़ी खीर के समान होता है। साथ ही त्वचा कैंसर का भय भी बना रहता है। अब लोगों में ऐसे रंगों के विपरीत प्राकृतिक रंगों के प्रति रुझान बढ़ाने का काम कई सामाजिक संस्थाएं कर रही हैं। मकसद सिर्फ ये है कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति सचेत किया जाए। इसी काम में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में वैज्ञानिकों की संस्था स्पैक्स (SPECS) की ओर से डीडब्ल्यूटी कॉलेज (DWT College) में होली के लिए प्राकृतिक एवं हर्बल रंग बनाने की कार्यशाला का आयोजन किया गया। मालूम हो कि चार मार्च को रंगों की होली खेली जानी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इस कार्यशाला का उद्देश्य जनसामान्य एवं विद्यार्थियों को रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों से अवगत कराना तथा घर पर सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल रंग बनाने की विधियों के बारे में जागरूक करना था। कार्यशाला का संचालन SPECS के सचिव एवं प्रसिद्ध विज्ञान संचारक डॉ. बृजमोहन शर्मा के मार्गदर्शन में किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
कार्यशाला में विद्यार्थियों को मेहंदी, हल्दी, चुकंदर, टेसू (पलाश) के फूल, गुड़हल, गेंदे के फूल, अनार के छिलके तथा अन्य प्राकृतिक स्रोतों से सुरक्षित एवं त्वचा के लिए लाभकारी रंग बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा तथा पारंपरिक भारतीय ज्ञान की महत्ता पर भी प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम में राम तीर्थ मौर्या, डॉ. आरती दीक्षित, डॉ. सुहासिनी ने इस जागरूकता कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी तथा सुरक्षित जीवनशैली के प्रति जागरूकता विकसित करती हैं। कार्यशाला में SPECS की ओर से सुरक्षित होली मनाने के लिए क्या करें और क्या न करें संबंधी जन-जागरूकता संदेश भी जारी किया गया। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
सुरक्षित होली खेलने के उपाय-होली खेलने से पहले शरीर एवं बालों में नारियल तेल या क्रीम लगाएं। इससे रसायनों का त्वचा पर प्रभाव कम होगा।
-बालों में तेल लगाने के साथ ही होंठों पर वैसलीन लगाएं।
-पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें। जैसे फुल स्लीव शर्ट, मोजे आदि।
-धूप और रंगों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सनस्क्रीन और चश्मे का उपयोग करें।
-आँखों में रंग जाने पर तुरंत साफ पानी से धोएं।
-केवल हर्बल और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें।
-रंग हटाने के लिए पहले सूखे हाथ से साफ करें। फिर गुनगुने पानी और हल्के साबुन से स्नान करें।
-स्नान के बाद मॉइस्चराइजर अवश्य लगाएँ। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ना करना ये गलती
-रासायनिक और सिंथेटिक रंगों का प्रयोग न करें।
-बच्चों और शिशुओं को जहरीले रंगों से दूर रखें।
-आँख, नाक, कान या घावों के पास रंग न लगाएँ।
-मिट्टी, गंदगी या हानिकारक पदार्थों का उपयोग न करें।
-रंगों को सांस के माध्यम से अंदर जाने से बचाएँ।
-नशे की स्थिति में वाहन न चलाएं।
-होली से पहले त्वचा संबंधी उपचार (फेशियल, वैक्सिंग आदि) से बचें। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
डॉ. बृजमोहन शर्मा की सलाह
डॉ. शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक रंग न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी पूर्णतः अनुकूल हैं। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि वे पर्यावरण-अनुकूल एवं सुरक्षित होली मनाकर प्रकृति के संरक्षण में योगदान दें। SPECS ने इस अवसर पर सभी से “स्वस्थ, सुरक्षित एवं पर्यावरण-अनुकूल होली” मनाने का संदेश दिया।
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Bhanu Bangwal
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भानु बंगवाल, देहरादून, उत्तराखंड।


