परेशान कर रहा नया ‘हीट इंडेक्स’, दिल्ली का तापमान 42 डिग्री और शरीर को लगा 51 डिग्री, जानिए वजह
आखिर ये नया ‘हीट इंडेक्स’ क्या है। ये लोगों का परेशान कर रहा है। 42 डिग्री सेल्सियस का तापमान भी शरीर को 51 डिग्री का लग रहा है। वो भी दिल्ली में। जी हां, दिल्ली वालों ने पिछले कुछ दिनों में मौसम की खबरों में एक नया आंकड़ा सुना। फील्स लाइक टेम्परेचर 50 डिग्री के पार पहुंच गया। कई लोगों ने सोचा, अरे… थर्मामीटर तो 42 डिग्री दिखा रहा है। फिर 50 डिग्री कहां से आ गया? दरअसल, यहां कोई नया तापमान नहीं मापा जा रहा। थर्मामीटर अब भी 42 डिग्री ही दिखा रहा है। 50 डिग्री का आंकड़ा एक अनुमान है। ऐसा अनुमान जो बताता है कि हवा का तापमान और नमी मिलकर इंसानी शरीर पर कितना असर डाल रहे हैं। इसी अनुमान को हीट इंडेक्स या फील्स लाइक टेम्परेचर कहते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
ऐसे समझिए हीट इंडेक्स
अब तक हम गर्मी को सिर्फ तापमान से समझते थे, लेकिन हमारा शरीर सिर्फ तापमान नहीं महसूस करता। वह यह भी महसूस करता है कि हवा में नमी कितनी है। मान लीजिए आज तापमान 42 डिग्री है। अगर हवा सूखी है, तो पसीना जल्दी सूख जाएगा। उसके साथ शरीर की गर्मी भी बाहर निकल जाएगी। इसके विपरीत अगर हवा में नमी बहुत ज्यादा है, तो पसीना त्वचा पर ही रह जाएगा। शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम धीमा पड़ने लगेगा। तब वही 42 डिग्री कहीं ज्यादा भारी लगने लगते हैं। यही असर हीट इंडेक्स बताने की कोशिश करता है। लेकिन यहां एक बात और समझनी जरूरी है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
अंतिम सच नहीं है हीट इंडेक्स
हीट इंडेक्स यह मानकर चलता है कि आप छांव में हैं, तेज धूप में नहीं। हवा भी बहुत तेज नहीं चल रही। अगर आप दिल्ली की दोपहर में खुले मैदान में खड़े हैं, धूप सीधे शरीर पर पड़ रही है, या कोई मेहनत वाला काम कर रहे हैं, तो आपके शरीर को महसूस होने वाली गर्मी हीट इंडेक्स से भी ज्यादा हो सकती है। यानी हीट इंडेक्स कोई अंतिम सच नहीं है। यह आम परिस्थितियों में एक उपयोगी अनुमान है। यह हर व्यक्ति के लिए भी एक जैसा नहीं होता। बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं, पहले से बीमार लोगों या बाहर काम करने वाले मजदूरों पर इसका असर अलग हो सकता है। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
वेट बल्ब टेम्परेचर और हीट इंडेक्स
इसी बीच पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन की चर्चा में एक और शब्द भी सुनाई देने लगा। वह शब्द है- वेट बल्ब टेम्परेचर। अक्सर लोग इसे ही हीट इंडेक्स समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग हैं। अगर हीट इंडेक्स पूछता है कि गर्मी आपको कैसी महसूस होगी? वहीं, तो वेट बल्ब टेम्परेचर पूछता है- क्या आपका शरीर पसीने के जरिये खुद को ठंडा भी कर पा रहा है? यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे बहुत गंभीरता से लेते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
इंसानी सहनशक्ति की सीमा
अगर वेट बल्ब टेम्परेचर लगभग 35 डिग्री सेल्सियस तक लंबे समय के लिए पहुंच जाए, तो स्वस्थ इंसान भी छांव में आराम करते हुए अपने शरीर को पर्याप्त ठंडा नहीं रख पाएगा। यह इंसानी सहनशक्ति की सीमा के आसपास माना जाता है। अच्छी बात यह है कि हाल के दिनों में दिल्ली का वेट बल्ब टेम्परेचर इस स्तर तक नहीं पहुंचा। यह लगभग 29 से 30 डिग्री के आसपास रहा। यह बेहद असहज और जोखिम भरा जरूर है, लेकिन उस चरम सीमा से अभी नीचे है, जहां शरीर के लिए हालात बेहद खतरनाक हो जाते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
यहीं खत्म नहीं होती कहानी, वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर भी है पैमाना
असल दुनिया इससे भी थोड़ी जटिल है। मान लीजिए कोई व्यक्ति दोपहर की धूप में सड़क बना रहा है। किसी खिलाड़ी की प्रैक्टिस चल रही है। कोई सैनिक अभ्यास कर रहा है। ऐसे मामलों में सिर्फ हीट इंडेक्स या वेट बल्ब टेम्परेचर काफी नहीं होते। तब विशेषज्ञ एक और पैमाना इस्तेमाल करते हैं, वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर, जिसे संक्षेप में डब्ल्यूबीजीटी (WBGT) कहा जाता है। यह तापमान और नमी के साथ धूप, हवा और आसपास से मिलने वाली गर्मी को भी जोड़कर बताता है कि बाहर काम करना कितना सुरक्षित है। इसलिए सेना, खेल संगठन, फैक्ट्रियां और कई देशों के कार्यस्थल सुरक्षा मानक इसी का इस्तेमाल करते हैं। (खबर जारी, अगले पैरे में देखिए)
बदल गया गर्मी को समझने का तरीका
दरअसल, जलवायु परिवर्तन ने सिर्फ गर्मी नहीं बढ़ाई है। उसने गर्मी को समझने का तरीका भी बदल दिया है। पहले हम सिर्फ पूछते थे-आज तापमान कितना है? अब हमें यह भी पूछना पड़ रहा है- आज हमारा शरीर इस गर्मी को कैसे महसूस करेगा। क्या वह खुद को ठंडा भी रख पाएगा? शायद आने वाले वर्षों में यही सवाल मौसम के सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक होगा।
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