समाज ने सहर्ष स्वीकारा समाज ने सहर्ष स्वीकारा है, निरक्षर स्त्री को मगर नही स्वीकार कर पाया, पुरुषों से ज्यादा...
साहित्य
इस गांवों में अब तो चिड़ियों ने भी चहचहाना छोड़ दिया। पहले कभी चिड़ियों की चहचहाट से सुबह होती थी...
बचपन में जब भी देहरादून से पिताजी के साथ मसूरी जाता, तो पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। तब शहनशाही आश्रम...
बारह साल की उम्र में जब मुझे साइकिल मिली तो मुझ पर घर के छोटे-छोटे काम की जिम्मेदारी भी आ...
जब मैं करीब पांच साल का था। तब बड़े भाई को साइकिल मिली और चोरी भी हो गई। इसके बाद...
समय समय यूँ ही बीत रहा है दिन यूँ ही गुजर रहा है। मंजिल का कुछ पता नहीं है साँसें...
सौदा कुर्सी का कुर्सी आगे, कुर्सी पीछे... सुन लो किस्सा, कुर्सी का... कल परसों नहीं, वर्षों से है... झगड़ा कुर्सी,...
आज विश्व साइकिल दिवस है। नेता लोगों से लेकर कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोग एक दिन के लिए साइकिल...
कभी-कभी सुनने में, तो कभी किसी बात को समझने में, कभी किसी को समझाने में कंफ्यूजन हो जाता है। यह...
माली देता है हर रोज पानी.. जो जनता है बिन पानी फूल नही खिला करते। वक़्त दिया करो हर रिश्ते...
