Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

July 12, 2026

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-रिस्ता-नाता

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-रिस्ता-नाता।

रिस्ता-नाता

नाता- रिस्तौं कु, कनु- अलबेलु सफर चा.
गौं- परिवारम, नाता- रिस्तौं झर- फर चा..

ब्वे-बुबा-ब्वाडा- भै-भैंणा, रैं- सदनि बड़ा,
बकि- सब फरि, रिस्तौंकि- पैनि नजर चा..

छ्वटु नौंनु दाजि- कका- ससुर, ह्वे सकद,
द्याखा धौं- रिस्तौंम, कख कोर- कसर चा..

रिस्तौं – ज्याळ फैल्यूं , सरा – उत्तराखण्ड,
कुल- गोत्र दग्ड़, जाति- बिरदरी पसर चा..

बड़दि-बात यख, झट-पट कनम- बिगड़द,
च्यूला-चपरा मन वळुं कि, खुसर-पुसर चा..

कखा नाता- कख- भिड़ि जा, नी- जड़ेंदु,
तबी त-बीचा पंज्वयूंकि, गुजर- बसर चा..

‘दीन’ ! देखि- भाऴी चला, बच्चों- बतावा,
आजबि- हर बात कु, दूर तक- असर चा..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।