Loksaakshya Social

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

Social menu is not set. You need to create menu and assign it to Social Menu on Menu Settings.

July 19, 2026

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-न ईं धार-न वीं धार

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-न ईं धार-न वीं धार।

न ईं धार-न वीं धार

सचम छैं- छौ कबि, खटकदार मीं.
सचम छैं- छौ कबि, झटकदार मीं..

अपण मुलका,लौ-बॉण रै जबतक,
अब त रैग्यूं, दिन-रातै घुटकदार मीं..

कोरि बकबास ह्वेगे, सोच तेरी-मेरी,
ह्वेग्युऊं अब त, निरा लटंगदार मीं..

न ताऴ-खुटि टेकड़ि, न ऐंच रखणीं,
बीच-बटम हुयूं छूं, अब-लम्पसार मीं..

घार बि अब, क्वी नि- मुख लगांदा,
इनम-ह्वेग्यूं, अब त-हिकमतहार मीं..

खेति-बाड़ी सारु, अब-कख कैकु रैगे,
मिल़ण लगीं, ध्याड़ि-धंदा पगार मीं..

‘दीन’ इनु बग्त बि, देखणु छौ-दिखेगे,
अब नि रैग्यो, ईं धार- न वीं धार मीं..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।