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August 10, 2026

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-मिं पुरणु बग्त छुं

कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-मिं पुरणु बग्त छुं।

मिं पुरणु बग्त छुं

एक-हैंका नजरोंम, अबि बि-मिं अकरु छूं.
चंदी भौ-मुलौं कबि, अबत-फट्यूं चदरु छूं..

समै का दगड़ि, घटदि- बढदि गै मोल- भौ,
उनत- पुरणां बगता, काम अयूं- मंदुरु छूं..

जमना देखणा- मिं ह्वेग्यूं , निखालिस ढुंगु,
कबि मिन-नाज पीस, सुण-मिं वी जंदुरु छूं..

नौं-गौं बदलि, यखतक कि-दुधबोलि बदलि,
पर ! अक्ल-सक्ल से, अज्यूंबि-वी चंदरु छूं..

कतगै बि- बदलौ ऐ-गे होलु, हमम- तुमम,
अज्यूंबि- कोलण्यूं लुकि, छ्वीं- सुड़दरु छूं..

जगा जनु- भेष बदळणु, हरेका- सुभौ च,
मीं-गोळकखड़ि न सम्झ, अब मिं कुंदरु छूं..

‘दीन’ पुर्ण्यूंन-कनु नाज पांणि खै, गुजरु कै,
आज मीं-सब भूलिगीं, पर मिं- वी गंदरु छूं..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।